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योग अभ्यास से पहले प्रार्थना के महत्व को वीडियो के माध्यम से समझें।

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योग और प्राणायाम

योग अभ्यास से पहले प्रार्थना का महत्व

शांत मन, सकारात्मक विचार और स्पष्ट संकल्प के साथ योग का आरंभ।

योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने का साधन नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा में सामंजस्य स्थापित करने की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसीलिए योगाभ्यास शुरू करने से पहले प्रार्थना करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। प्रार्थना मन को शांत, एकाग्र और सकारात्मक बनाती है, अतः योग का ही एक रूप है।

योग अभ्यास से पहले की जाने वाली प्रार्थना मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि मनोवैज्ञानिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से एक अत्यंत उपयोगी प्रक्रिया है। यह मन को शांत करती है, शरीर को संतुलित करती है और चेतना को जागृत करती है। प्रार्थना के साथ शुरू किया गया योग अभ्यास अधिक सुरक्षित, अधिक प्रभावी और अधिक आनंददायक हो जाता है, और अभ्यासकर्ता के लिए योग का सच्चा उद्देश्य – शरीर को स्वस्थ रखना – प्राप्त होता है।

प्रार्थना का मतलब यह कदापि नहीं हैं कि हमने जो कुछ भी चाहा वह भगवान् हमारी झोली में डाल देगें और हमें बिना किसी प्रयत्न के मनचाही मुराद प्राप्त हो जाएगी। जिस प्रकार हम मंदिर जा कर या घर में ही कोई पूजा पाठ आदि के आयोजन में भगवान् को कुछ फल, मिष्ठान्न आदि समर्पित करते हैं, लेकिन उसे भगवान् स्वयं ग्रहण नहीं करते और खाते हम ही हैं, उसी प्रकार जो भी हम प्रार्थना करते हैं उसे प्रयत्न करके प्राप्त करने का दायित्व भी हमारा स्वयं का ही हैं। प्रार्थना हमारे वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन इसलिए है कि जब हम बार बार एक बात को दोहराते हैं तो हमारे विचार भी उसी प्रकार बनने लगते हैं और हमारे अन्दर उसे प्राप्त करने की चाहत बढ़ने लगती है। दूसरे शब्दों में कहें तो रोज़ रोज़ की प्रार्थना एक प्रकार से हमारा संकल्प बन जाती है, और हमें उसे उसी रूप में लेना चाहिए।

हमने नीचे एक प्रार्थना दी है जो हमारे विचार में उचित है; लेकिन यह विल्कुल भी ज़रूरी नहीं कि आप यही प्रार्थना करें। आप अपने अनुसार अपनी प्रार्थना का स्वरुप निर्धारित करने के लिए स्वतन्त्र है। हमारा सन्देश केवल इतना है कि नित्य योग की शुरुआत प्रार्थना से करें।

वैदिक प्रार्थना

योग से पहले की प्रार्थनाएँ

प्रत्येक मंत्र के साथ उसका अर्थ भी दिया गया है, ताकि भाव समझकर पाठ किया जा सके।

यजुर्वेद · अध्याय 30 · मंत्र 3

कल्याणकारी गुणों की प्रार्थना

मंत्र

ॐ विश्वानि देव सवितुर्दुरितानी परा सुव |
यद्भद्रं तन्न आ सुव ||

हिन्दी अर्थ

हे सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्य युक्त, शुद्ध स्वरुप, सब सुखों के दाता परमेश्वर! आप कृपा करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को हमसे दूर करके, जो कल्याणकारी गुण, कर्म, स्वाभाव और पदार्थ है वह सब हमें प्रदान कराईये।

यजुर्वेद · अध्याय 34 · मंत्र 1

शुभ संकल्प की प्रार्थना

मंत्र

ॐ यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति |
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु ||

हिन्दी अर्थ

हे प्रभु! जो मन, जागृत अवस्था में दूर दूर तक चला जाता है, और उसी प्रकार सुप्तावस्था में भी वैसे ही दूर चला जाता है, ऐसा प्रकाश की किरणों की तरह दूर दूर तक जाने वाला मेरा मन जो प्रकाशों में से एक प्रकाश है, कल्याणकारी और शुभ संकल्पों वाला हो।

यजुर्वेद · अध्याय 36 · मंत्र 24

स्वस्थ और सार्थक जीवन की प्रार्थना

मंत्र

ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्।
पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शतं,
श्रुणुयाम शरदः शतं, प्रब्रवाम शरदः शतं,
अदीनाः स्याम शरदः शतं, भूयश्च शरदः शतात्॥

हिन्दी अर्थ

देवताओं द्वारा प्रतिष्ठित जगत के तेजस्वरुप तथा दिव्य तेजोमय भगवान् सूर्य जो पूर्व दिशा में उदित होते हैं; उनकी कृपा से हम सौ वर्षों तक देखें, सौ वर्षों तक हमारी तेज़ ज्योति बनी रहे, सौ वर्षों तक सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करें, सौ वर्षों तक हमारी सुनने की शक्ति बनी रहे, सौ वर्षों तक मधुर वाणी से युक्त रहें, सौ वर्षों तक किसी के सामने दीनता प्रकट न करें; सौ वर्षों से ऊपर भी बहुत काल तक हम देखें, जियें, सुनें, बोलें और अदीन रहें।

योग का समापन

योग का समापन भी शांति पाठ से करें

यजुर्वेद · अध्याय 36 · मंत्र 17

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षँ शान्तिः,
पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः,
सर्वँ शान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

मन्त्र का हिन्दी में अनुवाद

आकाश में शान्ति हो, वायु में शान्ति हो, पृथ्वी, जल, औषधियों और वनस्पतियों में शान्ति हो। समस्त प्रकृति और दिव्य शक्तियां संतुलित रहे, ब्रह्म (परम सत्य) में शान्ति हो। सभी ओर शान्ति ही शान्ति हो। शान्ति का स्वरूप भी शान्तिमय हो, और वही दिव्य शान्ति हमारे मन, वचन और कर्म में भी प्रकट हो।” ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति।

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