
ज्ञान के प्रति समर्पण
हे सच्चे ज्ञान के दाता प्रभु ! आप सार्वभौमिक मध्यस्थ हैं और सभी के कर्मों का सटीक परिणाम देते हैं। आज का मनुष्य आपके सच्चे ज्ञान वेद और प्रकृति की अवहेलना करके विभिन्न प्रकार की शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं से पीड़ित है। अपने भाइयों की इस पीड़ा से दुखी होकर, आपके इस पुत्र ने जिस भावना और इरादे से यह सब लिखने की कोशिश की है, उसे आप ही सबसे अच्छी तरह जानते हैं। मुझ जैसे अज्ञानी व्यक्ति के हृदय में ऐसी भावना उत्पन्न होना और उसका इस कार्य को पूरा करना केवल आपकी प्ररेणा का परिणाम है। इसलिए, यह कृति आपके चरणों में समर्पित है।



