लिपिड शब्द सबसे पहले ब्लूर (Bloor) ने 1943 में दिया था। वसा और वसा से सम्बंधित सभी पदार्थ सामूहिक रूप से लिपिड कहलाते हैं। अतः कोलेस्ट्रोल, ट्राइग्लिसराइड्स, एलडीएल, एचडीएल, वीएलडीएल, आदि सभी लिपिड के ही रूप हैं ।
हम जो कुछ भी खाते पीते हैं वह पाचन के बाद अपने गुण धर्म के अनुसार प्रोटीन, कार्बोहायड्रेट और फैट, में परिवर्तित हो जाता है।
इनमें से प्रोटीन हमारी मांसपेशियों के निर्माण और रखरखाव के काम आता है लेकिन शरीर की आवश्यकता से अधिक खाया गया प्रोटीन गुर्दे की क्षति, गुर्दे की पथरी, उच्च कोलेस्ट्रॉल, हृदय तनाव, कब्ज, निर्जलीकरण, हड्डियों के रोग, बड़ी आंत, और मलाशय के कैंसर आदि का कारण बनता है ।
कार्बोहाइड्रेट हमारे शरीर के ईंधन का मुख्य और पसंदीदा स्रोत हैं, जो हमारी कोशिकाओं, ऊतकों, अंगों और मस्तिष्क को शक्ति देने के लिए ग्लूकोज में बदल जाते हैं। कार्ब्स के प्रमुख कार्य ऊर्जा उत्पादन, मस्तिष्क समर्थन, प्रोटीन विघटन, पाचन और आंत के स्वास्थ्य, और हार्मोन का विनियमन हैं।
हमारे द्वारा खाये गये कार्ब्स की गुणवत्ता भी मायने रखती है। कॉम्प्लेक्स कार्ब्स साबुत अनाज, बीन्स, सब्जियों और फलों में पाया जाता है। वे धीरे-धीरे पचते हैं, ऊर्जा के स्तर को स्थिर रखते हैं और आवश्यक विटामिन, खनिज और फाइबर प्रदान करते हैं। सरल और परिष्कृत कार्ब्स: शर्करा युक्त पेय, मैदा, सफेद ब्रेड और पेस्ट्री में पाया जाता है। ये ठीक से नहीं पच पाते हैं, जिससे रक्त शर्करा में तेज वृद्धि होती है । शरीर की आवश्यकता से अधिक खाया गया कार्ब्स मोटापा, मधुमेह, फैटी लीवर, हृदय रोग, मेटाबोलिक सिंड्रोम, दंत क्षय आदि का कारण वनता है।
लिपिड (फैट– घी, तेल आदि) आवश्यक कार्बनिक यौगिक हैं जो केंद्रित ऊर्जा प्रदान करते हैं। लिपिड कार्बोहाइड्रेट या प्रोटीन से दोगुनी से भी अधिक उर्जा प्रदान करते हैं। लिपिड अतिरिक्त उर्जा को ट्राइग्लिसराइड्स के रूप में संग्रहित करते हैं ताकि आराम या उपवास के दौरान शरीर को आवश्यक ईंधन दिया जा सके। इसके अतिरिक्त कोशिकाओं के कवच, हार्मोन उत्पादन, और विटामिन के अवशोषण, मस्तिष्क और तंत्रिका कवच इसके मुख्य कार्य हैं। मस्तिष्क लिपिड पर बहुत अधिक निर्भर करता है। तंत्रिका की कोशिकाओं को ढकने वाला कवच ‘माइलिन’ वसा से बना होता है, जो न्यूरॉन्स को इन्सुलेट करता है और विद्युत संकेत संचरण को गति देता है।
इस प्रकार जहां वसा (फैट) की उपयोगिता और आवश्यकता अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं वहीं शरीर की आवश्यकता से अधिक फैट लिपिड्स के स्तर को बढ़ा कर मेटाबोलिक सिंड्रोम, मोटापा, हृदय रोग, धमनियों के ब्लॉकेज, स्ट्रोक, डायबिटीज, ऑस्टियोआर्थराइटिस, पित्ताशय की पथरी, यकृत रोग – फैटी लिवर से लेकर सिरोसिस या यकृत विफलता, स्तन, कोलोन, गैस्ट्रिक और लिवर कैंसर जैसे विशिष्ट कैंसर तक की गम्भीर समस्याओं का कारण भी बनता है ।
उपरोक्त विवरण से इतना स्पष्ट है कि शरीर में बढ़े हुए लिपिड का एक मात्र कारण नियमित रूप से शरीर की आवश्यकता से अधिक खाया गया भोजन है । अतः इसे शरीर की लिपिड की आवश्यकता बढ़ा कर जो केवल व्यायाम से बढ़ाई जा सकती है और/ या उपवास से प्राकृतिक रूप से नियमित किया जा सकता है ।
जहां तक दवाओं से बढ़े हुए लिपिड को ठीक करने का प्रश्न है तो पूरे विश्व में कोई ऐसी दवा नहीं है जो लाइफ स्टाइल ठीक किए बिना अपना कुछ प्रभाव रखती हो । एलोपैथी स्टेटिन्स से इसे मैनेज करती है और मैनेज करने का अर्थ क्योर नहीं होता; अर्थार्त इसे जीवन भर नियमित रूप से लेना होगा, कभी भी बंद करते ही लिपिड्स दुबारा बापस या पहले से भी अधिक हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि यह दवा हमारे शरीर के लिए एक प्रकार का अवांछित द्रव्य है जिसे हमारा शरीर स्वीकार नहीं करता । जैसा कि हम जानते हैं कि यदि गलती से भी कोई अवांछित द्रव्य हमारे पेट में चला जाये तो हमारा लिवर उसे स्वीकार न करके मल मूत्र के माध्यम से बाहर निकाल देता है । इसी प्रकार जब कोई भी सिंथेटिक दवा हमारे पेट में जाती है और अन्य आहार की तरह पूरी तरह पचने के बाद रक्त में परिवर्तित होने से पहले रस के रूप में यकृत (Liver) में जाती है, तब लिवर उसे शरीर के लिए स्वीकार न करते हुए मल मूत्र के माध्यम से बाहर निकाल देता है । लेकिन किसी भी अस्वीकार्य द्रव्य को बाहर फेंकने की liver की भी एक सीमित क्षमता है उससे अधिक वह शरीर से बाहर नहीं निकाल पायेगा । मान लीजिये किसी विशिष्ट द्रव्य की 15 मिलीग्राम मात्रा हमारा liver बाहर निकल सकता है और उसी द्रव्य की सिर्फ 10 मिलीग्राम मात्रा हमारी व्याधि पर अपना प्रभाव रखती है, तो हमारा डॉक्टर हमें 15 प्लस 10 अर्थात 25 मिलीग्राम दवा देगा जिसमें से 15 मिलीग्राम हमारा लिवर बाहर निकाल देगा और बाकी 10 मिलीग्राम शरीर के अन्दर जाकर अपना प्रभाव दिखाएगी।
लेकिन बात यहां समाप्त नहीं हो जाती । यह द्रव्य जब रक्त में मिल कर अन्य माध्यमों से होता हुआ सबसे अंत में हमारी कोशिकाओं तक पहुंचता है तो हमारी कोशिकाएं भी उसे स्वीकार नहीं करतीं । यदि यह कोशिकाओं के भी अन्दर चला जाये तो हमारी व्याधि भी ठीक हो जाएगी और हमें जीवन भर उस दवा को खाने की आवश्यकता नहीं रहेगी । लेकिन कोशिकाओं तक पहुँच कर उसके शरीर से बाहर निकलने के समस्त मार्ग तो बंद हो चुके होते हैं जब कोशिकाएं उस द्रव्य को स्वीकार नहीं करतीं तब वह केवल रक्त में भ्रमण करता रहता है और रक्त का परीक्षण कराने पर हमें लिपिड में सुधार नजर आता है जो दवा बंद करते ही समाप्त हो जाता है । लिपिड्स को कम करने के लिए जो स्टेटिन्स हमें दिये जाते हैं उनके अल्पावधि में साधारण और दीर्घकाल में गम्भीर दुष्परिणाम होते हैं जिनमें डायबिटीज, पाचन विकार, मायलगिया, रबडोमायोलिसिस, गुर्दे की विफलता, यकृत एंजाइम का बढ़ना, लिवर को क्षति, नींद की गड़बड़ी जैसी व्याधियां शामिल हैं।
यदि इन व्याधियों को वैकल्पिक दवाओं (होमियोपैथी, आयुर्वेद, यूनानी) आदि से ठीक करना चाहें तो यह दवाएं तभी अपना प्रभाव रखने में समर्थ हैं जब इनके साथ भोजन और जीवन शैली जैसी आदतों को भी सुधारा जाये । दूसरे शब्दों में यह दवाएं भोजन और जीवन शैली जैसे संसाधनों से लगने वाले समय में काफ़ी कमी कर सकती हैं पर इन संसाधनों के बिना व्याधि पूर्ण रूप से ठीक नहीं कर सकतीं। वैसे इन साधनों की उपयोगिता और आवश्यकता को तो आधुनिक विज्ञान भी एक मत से स्वीकार करता है। अतः बढ़े हुए लिपिड ठीक करने के लिए
- कैलोरी डेफिसिट डाइट लें: गूगल पर अपनी लम्वाई और बजन के हिसाब से अपनी वांछित कैलोरी जानें और जितनी कैलोरी की आवश्यकता हो उससे कम कैलोरी युक्त भोजन ही लें ।
- कुछ पदार्थों का पूर्ण वहिष्कार करें : मैदा और मैदा से बने पदार्थ, तले हुए पदार्थ, सभी रिफाइंड पदार्थ, प्रोसेस किए हुए पदार्थ, पैक किए हुए खाद्य पदार्थ, रेडी टू ईट पदार्थ, बेकरी उत्पाद, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, अल्कोहल, धूम्रपान, तंबाकू।
- सभी रिफाइंड पदार्थों का स्वस्थ विकल्प चुनें : चीनी की जगह घर पर बनाया खजूर का सीरप, गुड़ या देशी खांड, नमक की जगह सेंधा नमक, काला नमक, रिफाइंड तेल की जगह कच्ची घानी का तेल, मैदा की जगह साबुत अनाज का चोकर सहित आटा, पोलिश किए चावल की जगह साठी, लाल या ब्राउन चावल. पोलिश की हुई दालों की जगह बिना पोलिश की हुई दालें आदि ।
- उपयोग किए जाने वाले फैट की मात्रा बहुत कम करें और हानिकारक फैट के उपयोग से बचें । सभी सेवनीय फैट में देशी गाय का घी सबसे उत्तम है, उसके बाद सरसों , मूंगफली या नारियल का कच्ची घानी तेल ।
- भोजन नियंत्रित करें : दिन में अधिक से अधिक तीन बार – ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर । दो भोजन के बीच पानी या नींबू पानी के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। किसी भी भोजन में पेट पूरा नहीं भरें, कम से कम 25-30 प्रतिशत पेट खाली रखें।
- भोजन के समय में भी सुधार करें : किसी भी प्रकार के भोजन का समय केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही होता है । सूर्यास्त के बाद कुछ भी नहीं ।
- दिन की शुरुवात गर्म पानी में ताज़े नींबू के रस से करें ।
- भोजन में रोटी , चावल आदि कार्ब्स कम से कम करके सलाद, मौसमी फल, और हरी सब्जियों की मात्रा बढायें । पत्तेदार हरी सब्जियां और छाछ भी भोजन में अवश्य शामिल करें ।
- गेहूं का प्रयोग कम करें, बंद कर देना सबसे अच्छा है, मोटे अनाजों का आटा चोकर सहित प्रयोग करें : जौ, ज्वार, चना, वाजरा, मक्का आदि।
- नमक का सेवन भी कम करें और रात्रि का भोजन विल्कुल हल्का और सुपाच्य करें । इसके लिए ब्रेकफास्ट और डिनर में पकाए हुए पदार्थों की जगह केवल सलाद, मौसमी फल, छाछ, दूध का प्रयोग करें । इतने से काम न चले तो अंकुरित अनाज, नमक विहीन भुने हुए अनाज, हरी सब्जियों का सूप तक सीमित करें ।
- वजन कम करें ।
- नियमित रूप से व्यायाम करें। हमारे शरीर को एरोबिक, डायनामिक और आइसोमेट्रिक तीनों प्रकार के व्यायामों की आवश्यकता होती है । अतः या तो यह तीनों व्यायाम करें या फिर 8 से 10000 कदम चलना , योग, प्राणायाम और ध्यान करें। इनसे तीनों प्रकार के व्यायाम के लाभ के साथ कुछ अन्य लाभ भी मिलते हैं हैं।
- 6 से 8 घंटे की नियमित समय की नींद मेटाबोलिक स्वास्थ्य बनाये रखने में सहायक है।
सामान्यतया बढ़े हुए लिपिड का पता तब चलता है जब इसके दुष्परिणाम से कोई अन्य समस्या या समस्याएं जन्म ले चुकी होती हैं और रोगी के उपचार के लिए उसकी सभी समस्यायों को समग्र रूप से लक्षित करने की आवश्यकता होती है और उसके अनुसार ही उसके भोजन और जीवन शैली में उचित सुधार के साथ साथ दवाओं के महत्व को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता।
अपने गम्भीर रोगों की सम्पूर्ण चिकित्सा के लिए आप चाहें तो हमसे सम्पर्क कर सकते हैं।

