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(स्वर्गीय) डॉ. फुन्दनलाल अग्निहोत्री एम.डी.,डी.एस.,एल.एम.आर.ए.एस.(लन्दन) द्वारा लिखित पुस्तकें :
इन पुस्तकों की कागज़ी प्रति (हार्ड कॉपी) से सॉफ्ट कॉपी तैयार की जा रही है। जैसे जैसे सॉफ्ट कॉपी तैयार होती जएगी, एक एक करके यह सभी पुस्तकें शीघ्र ही इस वेबसाइट पर निशुल्क Free download के लिए उपलब्ध होती जायेंगी ।
यज्ञ चिकित्सा (क्षय रोग की प्राकृतिक अचूक चिकित्सा)
यह पुस्तक डॉ. फुन्दन लाल जी द्वारा 1940 के लगभग T.B. पर किए गये शोध कार्य पर आधारित है । यह पुस्तक 1949 में छपी थी । उस समय T.B. उतनी ही गम्भीर व्याधि थी जितनी 1960 के दशक में कैंसर की थी । इस शोध कार्य पर ब्रिटिश सरकार ने डॉक्टर साहब को पुरुस्कृत करने के साथ जबलपुर में टी. बी.सेनिटोरियम का अध्यक्ष भी नियुक्त किया । सेनिटोरियम में उनकी शोध आधारित चिकित्सा की सफलता का परिणाम 80% पाया गया जबकि शेष 20% भी वह रोगी थे जो सेनिटोरियम में जगह न होने के कारण आस पास किराये की जगह ले कर चिकित्सा करा रहे थे और उसका व्यय वहन न कर पाने के कारण बीच में ही चिकित्सा छोड़ कर चले गये थे ।
उनकी चिकित्सा में गाय का दूध, घी, छाछ आदि पदार्थ भी उपयोग होते थे और इन पदार्थों की आपूर्ति के लिए सेनिटोरियम में ब्रिटिश सरकार से स्वीकृत एक गौशाला भी थी ताकि गायों और गौशाला की स्वच्छता और उचित भोजन से इन पदार्थों की अनुकूल गुणवत्ता बनी रहे ।
आज़ादी के बाद भारतीय सरकार को सेनिटोरियम में गौशाला होने से भयंकर आपात्ति थी और वह इसे हटाने पर अडिग थी । उस समय के प. रवि शंकर शुक्ला, मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद (यूनियन मिनिस्टर) डॉ राजेंद्र प्रसाद (संविधान सभा के अध्यक्ष, भारत के पहले राष्ट्रपति) आदि जैसे दिग्गज नेताओं को अज्ञात कारणों से यह बात समझने में नहीं आ सकी कि गाय, और गौ शाला की स्वच्छता और उसके भोजन आदि से उसके दूध की गुणवत्ता में भी कुछ फर्क आ सकता है और सारी की सारी सरकारी मशीनरी इस बात पर अडिग रही कि गौशाला हटा कर इन उत्पादों को आउटसोर्स किया जाये । डॉक्टर साहब ने इस बात पर समझौता करना उचित नहीं समझा और सेनिटोरियम के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे कर अपनी निजी प्रैक्टिस करने का निर्णय लिया और जबलपुर से स्थान परिवर्तन करके उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में बापस आ गए और अनेक वर्षों तक अपनी निज़ी प्रैक्टिस की । 15 दिसम्बर 1962 , सायं 4 बजे 82 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ ।
देवयज्ञ :
1941 में प्रकाशित इस पुस्तक में डॉक्टर साहब ने न केवल हवन यज्ञ की वैज्ञानिक विवेचना से उसके कृमि नाशक गुणों पर प्रकाश डाला है बल्कि यह गुण किस प्रकार और कैसे आते हैं, आदि सभी बातों की चर्चा करते हुए संक्रामक रोगों में यज्ञ की भूमिका और उसके महत्व, दैनिक यज्ञ से रोगों से वचाब आदि की भी चर्चा करके हुए यह भी बताया है कि किस रोग की हवन सामग्री में कौन कौन सी जड़ी बूटियां तथा अन्य पदार्थों का किस मात्रा में किस प्रकार से सम्मिश्रण किया जाना चाहिए । इस प्रकार विभिन्न रोगों की हवं सामिग्री के नुस्खे और ऋतुओं के अनुसार रोग रक्षक हवन सामग्री के नुस्खे इस पुस्तक की विशेषता हैं । साथ ही यह पुस्तक उन भ्रान्तियों को भी दूर करने में सक्षम है जो लकड़ी जलाने से संभावित हानि के विषय में फैलाई गई हैं और किस प्रकार से हवन करने से उन हानियों को लाभ में परिवर्तित किया जा सकता है । अर्थात हवन यज्ञ करने की सही और वैज्ञानिक और लाभकारी विधि जो धार्मिक रिवाजों पर आधारित न होकर पूर्णतया विज्ञान सम्मत बातों पर आधारित है ।
आरोग्य शास्त्र :
यह पुस्तक विक्रम संवत 2007 (वर्ष 1950) में छपी थी । पूज्य डॉक्टर साहब का मानना था कि वैद्य , डॉक्टर आदि की सही भूमिका उन बातों का प्रचार और प्रसारण होना चाहिए जिनको दैनिक जीवन में अपना कर हम कभी रोगी ही न हों । इस पुस्तक की पूरी की पूरी प्रष्ठभूमि इसी विचारधारा पर आधारित है । स्वस्थ जीवन या रोगयुक्त जीवन की बीजारोपण तो वाल्यावस्था में ही हो जाता है और जैसा कि हम सभी जानते हैं कि लगभग 12 वर्ष की आयु तक अन्य विषयों के साथ साथ स्वास्थ्य या रोग के बीजारोपण का दायित्व भी माता – पिता का होता है लेकिन उसके बाद जैसे जैसे किशोरावस्था में बालक आगे बढ़ता जाता है उसके स्वयं के विचार और धारणाएं धीरे धीरे अपना रूप लेने लगती हैं । इसीलिए डॉक्टर साहब ने इस पुस्तक का समर्पण भी नवयुवकों को किया है; जिससे वह स्वास्थ्य के मूलभूत पहलुओं को समझ कर अपना और अपने मित्रों, सम्बन्धियों आदि का भी जीवन सुखमय बना सकें । 1950 में छपी इस पुस्तक में स्वास्थ्य के आवश्यक विभिन्न पहलुओं के साथ साथ व्यायाम , प्राणायाम आदि का महत्व और विधि जैसे विषयों के साथ साथ भिभिन्न ऋतुओं में हमारी दिनचर्या में क्या और कैसे परिवर्तनों की आवश्यकता होती है जैसे विषयों पर भी प्रकाश डाला गया है ।
यह पुस्तक हर उस व्यक्ति के लिए अमृतकोष के समान है जो वास्तव में रोगमुक्त और दीर्घायु जीवन व्यतीत करना चाहता है ।
आयुर्वेदिक प्राकृतिक चिकित्सा :
यह पुस्तक कुछ देर से 1955 में छपी थी । कुछ देरी से छपने का कारण यह था कि पुस्तक लिखी जाने के बाद डॉक्टर साहब ने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष श्री गणेश वासुदेव मावलणकर जी से पुस्तक का आमुख लिखने का अनुरोध किया । मावलणकर जी ने आमुख लिखने की एक शर्त रखी कि वह पूरी पुस्तक स्वयं पढ़े बिना आमुख नहीं लिखेंगे और व्यस्तता , समयाभाव आदि के कारण वह यह नहीं बता सकते की उन्हें इस कार्य में कितना समय लगेगा । वास्तव में उन्होंने पूरी पुस्तक पढ़ कर ही अपने विचार उदागर किए और इस कार्य में उन्हें अप्रत्याशित समय लगा क्योंकि उन्होंने अपने व्यस्त कार्यक्रमों के बीच थोड़ा थोड़ा समय निकाल कर इसे शुरू से अंत तक धीरे धीरे पढ़ा । अपने आमुख में एक जगह उन्होंने लिखा “ उन्होंने हरेक चीज़ वेदों में थी ऐसा प्रस्थापित करने का जो प्रयास किया है उसमें मुझे तो शास्त्रीय पद्दति से ज्यादातर उनका वेदों पर प्रेम और भक्ति मालूम होती है । जो उन्होंने कहा है वह सव वेदों में हो या न हो लेकिन वह सत्य है और उनकी बात को स्वीकार करने में ही भारत जैसे गरीब देश में बिना खर्च या बहुत थोड़े खर्च से जनता के आरोग्य का और बीमारियों के उपचार करने का सवाल आसानी से और ऊंचे ढंग से और शास्त्रीय रीति से हल हो सकता है ऐसा दिखाई पड़ता है ।
इस पुस्तक में डॉक्टर साहब ने जहाँ सप्रमाण यह प्रस्थाप्रित किया है सब ही प्रचलित चिकित्सा विधियों का जन्मदाता आयुर्वेद है और एक सफल चिकित्सक को सब ही चिकित्सा विधियों का ज्ञान होना भी आवश्यक है । केवल धन कमाने के उद्देश्य से दवा वेचना और किसी एक चिकित्सा विधि का ज्ञान प्राप्त कर हर प्रकार और हर प्रकृति के रोगी पर एक ही चिकित्सा विधि का प्रयोग करते रहना और दूसरी सब विधियों का विरोध करना मनुष्य धर्म के विरुद्ध है वहां अपने 50 वर्षीय अनुभव के आधार पर चिकित्सा के उन साधनों का भी वर्णन किया है जो रोगों के उपचार और उन्मूलन में अपना महत्व रखते हैं ।
पुस्तक में प्रचलित चिकित्सा के सम्बन्ध में उसके ही विद्द्वानों की सम्मति , प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास और वर्णन कि उसके लाभ देख कर किस प्रकार बड़े बड़े प्रसिद्ध ऐलोपैथिक डॉक्टरों ने उसे अपनाया, वैदिक जल चिकित्सा, अमेरिका का न्यू हाइजीन ट्रीटमेंट, रोग का वास्तविक कारण, भोजन, उपवास, आदि विषयों की विवेचना के साथ साथ अनेक रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा का भी वर्णन किया गया है ।
नोट : यह चारों पुस्तकें एक एक करके शीघ्र ही इस वेबसाइट पर Free Download के लिए उपलब्ध होने वाली हैं ।
डॉ. धुरेन्द्र शास्त्री अग्निहोत्री बी.एम.एस.,एम.डी.(ए.एम.),एम.डी.(नेचुरोपैथी), ए.आई.ए.सी.एच. (ग्रीस) द्वारा विचाराधीन पुस्तकें :
क्योंकि डॉ. धुरेन्द्र के पूज्य पिता डॉ. श्री फुन्दन लाल जी का देहांत उनकी किशोरावस्था में ही हो गया था जिस कारण उन्हें अपने पिता से चिकित्सा सम्बन्धी विशिष्ठ ज्ञान प्राप्त करने का अवसर तो नहीं मिल सका. तथापि उतने समय के सानिध्य से जितना कुछ भी समझ सके थे, उसके आधार पर उन्होंने होम्योपैथी में ज्ञान प्राप्त करने का निर्णय लिया और होम्योपैथी में बैचलर ऑफ़ मेडिसिन एंड सर्जरी (B.M.S.) की उपाधि प्राप्त की । जब वह इस पाठ्यक्रम के अंतिम बर्ष में थे, उनकी पूज्य माता को कैंसर हुआ और वह यह देख कर गहरा सदमा और आश्चर्य हुआ कि जिस चिकित्सा विधि को वह सर्वोपरि समझ रहे थे उसमें अत्यंत निपुण एवं अनुभवी ऐसे डॉक्टर जिनके पास लगभग 100 रोगी नित्य आया करते थे, उनके मार्गदर्शन में पूरी तन्मयता से चिकित्सा करने के बाद भी उनकी माता बच न सकीं । इस घटना ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि कहीं न कहीं होम्योपैथी में कुछ कमी तो है और वह उसे दूंढने में लग गये। उन्होंने पाया कि होम्योपैथी के भी प्राचीन ग्रंथों में गम्भीर रोगों की चिकित्सा में औषधियों के साथ अनेक उपसाधनों का भी जिक्र है जो नेचुरोपैथी पर आधारित थे। साथ ही उन्होंने अपने पूज्य पिताजी की उन पुस्तकों का भी दुबारा अध्ययन किया जिन्हें उन्होंने बचपन में आधी अधूरी समझ के साथ पढ़ा था । साथ ही उन्होंने अपने पूज्य पिताजी की एक ऐसी पुस्तक “आहार चिकित्सा” जिसका प्रकाशन नहीं हो सका था लेकिन उसकी हस्त लिखित प्रतिलिपि कुछ जीर्ण क्षीर्ण अवस्था में उपलब्ध थी । इस सब से उन्हें यह समझ में आया कि त्वरित (एक्यूट) बीमारियों में तो होम्योपैथी अपने आप में बहुत कारगर है लेकिन क्रोनिक और गंभीर रोगों के सफल, सम्पूर्ण और स्थायी उपचार के लिए उसके साथ साथ नेचुरोपैथी को भी अपनाना आवश्यक है और इस सबमें भोजन तो सर्वोपरि है जिसे ठीक किए बिना अच्छी से अच्छी दवा भी अपना काम नहीं कर सकती । अतः इन विधियों को भी अपनी चिकित्सा में शामिल करने के लिए उन्होंने M.D.(A.M.) और M.D.(Nat.) की शिक्षा भी ली । साथ ही अपने होम्योपैथी के ज्ञान को और पुख्ता करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पुरुस्कार the Right Livelihood Award (also known as the “Alternative Nobel Prize”) के साथ साथ अन्य कई पुरूस्कार प्राप्त Shree George Vithoulkas ग्रीस द्वारा प्रस्थापित इंटरनेशनल एकेडेमी ऑफ़ क्लासिकल होम्योपैथी से होम्योपैथी के एडवांस शिक्षा भी प्राप्त की ।
उन्होंने सभी गम्भीर रोगों की अपनी चिकित्सा पद्धति में होम्योपैथी के साथ, घर पर ही की जा सकने योग्य नेचुरोपैथी, भोजन सुधार , योग, एक्यूप्रेशर और हेर्बलिस्म का समन्वय करके गम्भीर रोगों से जूझ रहे अनेक रोगियों का सफल उपचार किया । यद्दपि बहुत देर से, लेकिन अब 79 वर्ष की आयु में परमपिता परमात्मा ने उनके मन में विचार उत्पन्न किया कि इस समन्वित चिकित्सा विधि द्वारा गम्भीर रोगों की सफल चिकित्सा के विस्तृत विवरण को पुस्तकों का रूप दे दिया जाये जिससे उनके जीवनोपरान्त भी यह ज्ञान इच्छुक चिकित्सकों और रोगियों का मार्गदर्शन करता रहे ।
हांलाकि यह लेखन कार्य अभी केवल विचारणीय स्तर पर है, फिर भी यहां इसकी चर्चा केवल इस उद्देश्य से करना प्रासंगिक लगा ताकि यह डॉ. धुरेन्द्र का संकल्प बन कर उन्हें इस कार्य को जल्द से जल्द अपने अंजाम तक पहूंचाने की प्रेरणा देता रहे ।
हमारा विश्वास है कि अपने पूज्य पिताजी की पुस्तकें इस वेबसाइट पर उपलब्ध हो जाने के कार्य से निवृत होते ही वह पूरी तन्मयता से इन पुस्तकों के लेखन कार्य में लग जायेंगे और एक एक करके प्रतावित सभी पुस्तकों को मूर्तरूप दे सकेंगे । क्योंकि स्वस्थ बने रहने और रोगोपचार दोनों में ही उचित आहार का महत्वपूर्ण योगदान है और भोजन सुधार के बिना किसी भी चिकित्सा विधि से गम्भीर रोग कदापि ठीक नहीं किए जा सकते इसलिए हम सर्वप्रथम इस विषय पर पुस्तक उपलब्ध करने का विचार रखते हैं । उसके बाद दूसरे आवश्यक साधन योग, प्राणायाम आदि पर और उसके बाद ओबेसिटी (मोटापा) जो अपने आप में एक गम्भीर समस्या होने के साथ अनेक दूसरी गम्भीर बीमारियों का जन्मदाता भी है । उसके बाद एक एक करके क्रमशः दूसरी गम्भीर बीमारियों के सफल और स्थायी उपचार से सम्बंधित । प्रभु हमें इस कार्य की शीघ्र पूर्ण करने की शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें ऐसी प्रार्थना है ।
विचाराधीन पुस्तकों की सूची :
- भोजन और स्वास्थ्य : (स्वास्थ्य और उपचार में भोजन का महत्व)
- व्यापक योग
- मोटापा कारण और निवारण
- कैंसर कारण और निवारण
- ह्रदय रोग कारण और निवारण
- डायबिटीज कारण और निवारण
- वात रोग कारण और निवारण
- श्वसन रोग कारण और निवारण
- पाचन रोग कारण और निवारण
- यकृत के रोग कारण और निवारण
- किडनी के रोग कारण और निवारण
- महिलाओं के रोग कारण और निवारण
