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सी आर टी (कम्पलीट रिलैक्सेशन टेकनीक)

शवासन (पूर्ण विश्राम विधि) की विधि

  • 01
    योगा मैट या हार्ड बेड पर पीठ के बल बिल्कुल आरामदायक स्थिति में सीधे लेट जाएं। यदि रीढ़ की हड्डी के किसी रोग या अन्य कारण से सीधा लेटने में असुविधा हो अथवा लोअर बैक सतह से ऊपर उठता हो, तो घुटनों के नीचे एक गोल तकिया रखें। आवश्यकता होने पर सिर के नीचे पतला तकिया भी रख सकते हैं।
  • 02
    दोनों पैरों के बीच लगभग 1 से 1½ फीट की दूरी रखें। दोनों हाथ शरीर के बगल में लगभग 6 से 8 इंच की दूरी पर रखें। हथेलियाँ ऊपर की ओर आधी खुली रहें तथा पैर की एड़ियाँ और पंजे बिना किसी प्रयास के स्वाभाविक रूप से बाहर की ओर झुके रहें।
  • 03
    पूरे शरीर को शव की भाँति पूर्णतः स्थिर और ढीला छोड़ दें। आँखें कोमलता से बंद करें तथा अपना ध्यान आती-जाती श्वास पर केन्द्रित करें। श्वास को सहज, शांत और समरूप होने दें।
  • 04
    जब श्वास स्थिर और संतुलित हो जाए, तब अपना ध्यान दोनों पैरों के अंगूठों पर केन्द्रित करें। उन्हें पूर्णतः शिथिल करें तथा उनमें होने वाले विश्राम का अनुभव करें।
  • 05
    अब अपना ध्यान दोनों पैरों के पंजों पर ले जाएं। पंजों को पूरी तरह ढीला छोड़ दें और उनमें आने वाले पूर्ण विश्राम का अनुभव करें।
  • 06
    अपना ध्यान दोनों एड़ियों पर केन्द्रित करें। एड़ियों को पूर्णतः शिथिल करें तथा उनमें होने वाले विश्राम को महसूस करें।
  • 07
    अब दोनों पिंडलियों पर ध्यान केन्द्रित करें। पिंडलियों की सभी मांसपेशियों को पूरी तरह ढीला छोड़ दें और उनमें होने वाली शिथिलता का अनुभव करें।
  • 08
    अपना ध्यान दोनों घुटनों पर ले जाएं। घुटनों की कटोरियों, घुटनों के जोड़ों तथा आसपास की मांसपेशियों को पूर्णतः शिथिल करें और उनमें होने वाले विश्राम का अनुभव करें।
  • 09
    अब अपना ध्यान जांघों के निचले भाग तथा पूरी जांघों पर केन्द्रित करें। जांघों की सभी मांसपेशियों को पूरी तरह ढीला छोड़ दें और उनमें आने वाले पूर्ण विश्राम का अनुभव करें।
  • 10
    अब ग्रोइन (Groin) क्षेत्र, पेल्विक भाग तथा नाभि के नीचे के पूरे हिस्से को शिथिल करें। पैर के अंगूठों से लेकर पेल्विक क्षेत्र तक पूरे निचले शरीर एवं प्रत्येक कोशिका में गहरे विश्राम का अनुभव करें। इस विश्राम को और गहराई से अनुभव करने के लिए ‘अ’ (अकार) की लंबी ध्वनि करें।

  • 11
    अब दूसरे चरण में शरीर के मध्य भाग को पूर्णतः शिथिल करेंगे। अपना ध्यान नाभि पर केन्द्रित करें और नाभि के चारों ओर के पूरे भाग को पूर्णतः ढीला छोड़कर उसमें होने वाले गहरे विश्राम का अनुभव करें।
  • 12
    अब अपना ध्यान नाभि के ऊपर स्थित पेट के अंगों, विशेष रूप से यकृत (Liver) तथा प्लीहा (Spleen) पर केन्द्रित करें। इन अंगों को पूर्णतः शिथिल होने दें और उनमें आने वाले शांत एवं गहरे विश्राम का अनुभव करें।
  • 13
    अपना ध्यान डायफ्राम (Diaphragm) पर केन्द्रित करें। उसे पूरी तरह शिथिल करें और श्वास के साथ उसमें होने वाली सहज गति एवं विश्राम को महसूस करें।
  • 14
    अब अपना ध्यान छाती और दोनों फेफड़ों पर ले जाएं। फेफड़ों को पूर्णतः शिथिल करें और प्रत्येक सहज श्वास के साथ उनमें होने वाले शांत विश्राम का अनुभव करें।
  • 15
    अपना ध्यान हृदय पर केन्द्रित करें। हृदय को शिथिल होने दें और उसमें उत्पन्न होने वाली गहरी शांति तथा विश्राम की अनुभूति करें।
  • 16
    अब अपना ध्यान दोनों हाथों की उंगलियों पर ले जाएं। उंगलियों, हथेलियों, उंगलियों के जोड़ों तथा कलाइयों को पूर्णतः ढीला छोड़ दें और उनमें होने वाले विश्राम का अनुभव करें।
  • 17
    कलाइयों से लेकर कोहनियों तक के पूरे भाग को शिथिल करें। अग्रबाहु (Forearm) की सभी मांसपेशियों को ढीला छोड़ दें और उनमें आने वाले पूर्ण विश्राम का अनुभव करें।
  • 18
    अब दोनों भुजाओं तथा कंधों को पूर्णतः शिथिल करें। कंधों के सभी जोड़ों एवं मांसपेशियों को पूरी तरह ढीला छोड़ दें और उनमें आने वाले गहरे विश्राम को महसूस करें।
  • 19
    नाभि से लेकर कंधों तक पूरे शरीर के मध्य भाग में आई पूर्ण शिथिलता एवं विश्राम का अनुभव करें। महसूस करें कि यह सम्पूर्ण भाग पूर्णतः शांत, हल्का और तनावमुक्त हो चुका है।
  • 20
    अब शरीर के मध्य भाग में आए विश्राम को और गहराई तक अनुभव करने के लिए ‘ऊ’ (ऊकार) की लंबी ध्वनि करें। ध्वनि की तरंगों को पूरे मध्य भाग में फैलता हुआ अनुभव करें और शरीर को और अधिक शांत एवं विश्राम की अवस्था में जाने दें।

  • 21
    अब तीसरे चरण में शरीर के ऊपरी भाग को पूर्णतः शिथिल करेंगे। सर्वप्रथम अपना ध्यान गर्दन पर केन्द्रित करें। गर्दन की सभी मांसपेशियों को ढीला छोड़ दें और उनमें होने वाले पूर्ण विश्राम का अनुभव करें।
  • 22
    अपना ध्यान ठोड़ी पर केन्द्रित करें। ठोड़ी को पूरी तरह शिथिल करें और उसमें होने वाले शांत एवं गहरे विश्राम का अनुभव करें।
  • 23
    अब दोनों जबड़ों को पूर्णतः ढीला छोड़ दें। जबड़ों की सभी मांसपेशियों को शिथिल करते हुए उनमें होने वाले पूर्ण विश्राम का अनुभव करें।
  • 24
    अपना ध्यान दोनों गालों पर केन्द्रित करें। चेहरे की मांसपेशियों को पूरी तरह ढीला छोड़ दें और उनमें आने वाली शांति तथा विश्राम को महसूस करें।
  • 25
    अब अपना ध्यान नाक पर केन्द्रित करें। नाक तथा उसके आसपास के पूरे भाग को शिथिल करें और सहज श्वास के साथ विश्राम का अनुभव करें।
  • 26
    अपना ध्यान दोनों कानों पर केन्द्रित करें। कानों को पूर्णतः शिथिल करें और उनमें होने वाली शांति एवं विश्राम की अनुभूति करें।
  • 27
    अब दोनों आँखों, भौंहों तथा माथे पर ध्यान केन्द्रित करें। आँखों के गोलों, पलकों, भौंहों और पूरे माथे को पूरी तरह ढीला छोड़ दें तथा उनमें होने वाले गहरे विश्राम का अनुभव करें।
  • 28
    अपना ध्यान सिर और मस्तिष्क पर केन्द्रित करें। सिर की सभी मांसपेशियों तथा मस्तिष्क को पूर्णतः शिथिल करें और उनमें होने वाले गहरे विश्राम एवं शांति का अनुभव करें।
  • 29
    अब शरीर के ऊपरी भाग में आए विश्राम को और गहराई तक अनुभव करने के लिए ‘उं’ (मकार) की लंबी ध्वनि करें। ध्वनि की तरंगों को सिर, मस्तिष्क तथा पूरे ऊपरी भाग में फैलता हुआ अनुभव करें और उन्हें धीरे-धीरे शांत होने दें।
  • 30
    अब पैर के अंगूठों से लेकर सिर के शीर्ष तक पूरा शरीर पूर्णतः शिथिल और विश्राम की अवस्था में है। इस गहरे विश्राम का अनुभव करें। फिर अ… ऊ… उं… (ॐ) की संयुक्त ध्वनि का उच्चारण करें और उसकी कंपन तरंगों को पूरे शरीर की प्रत्येक कोशिका में अनुभव करें।

  • 31
    अब पूरे शरीर में आए गहरे विश्राम, शांति और स्थिरता का अनुभव करें। महसूस करें कि शरीर की प्रत्येक मांसपेशी, प्रत्येक जोड़ तथा प्रत्येक कोशिका पूर्णतः शिथिल और विश्राम की अवस्था में है।
  • 32
    धीरे-धीरे हाथों और पैरों की उंगलियों में हल्की-हल्की हलचल करें। पूरे शरीर में चेतना का अनुभव करते हुए भी विश्राम की अवस्था को बनाए रखें।
  • 33
    धीरे से दोनों एड़ियों को आपस में मिला लें। बिना किसी झटके के दाहिने हाथ को जमीन के सहारे सिर के ऊपर ले जाएं।
  • 34
    बाएं घुटने को मोड़कर दाहिनी ओर करवट लें। बाएं हाथ को कंधे के पास लाएं तथा हथेली का सहारा लेते हुए कुछ क्षण इसी अवस्था में विश्राम करें।
  • 35
    अब दोनों हाथों की सहायता से धीरे-धीरे बैठने की अवस्था में आएं। कुछ क्षण शांत बैठकर शरीर और मन में बने हुए गहरे विश्राम तथा शांति का अनुभव करते रहें।
  • 36
    जब शरीर पूर्णतः सामान्य अनुभव होने लगे, तब धीरे-धीरे आंखें खोलें। इसी के साथ शवासन (पूर्ण विश्राम विधि) का अभ्यास सम्पन्न होता है।

शवासन (पूर्ण विश्राम विधि) के लाभ

  • शरीर की प्रत्येक मांसपेशी, जोड़ तथा तंत्रिका तंत्र को गहरा विश्राम प्रदान करता है।
  • मानसिक तनाव, चिंता, थकान एवं चिड़चिड़ापन को कम करके मन को शांत करता है।
  • रक्तचाप एवं हृदय गति को संतुलित करने में सहायक है।
  • श्वसन को सहज एवं गहरा बनाकर फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार करता है।
  • शरीर और मन के बीच संतुलन स्थापित करता है तथा ध्यान की तैयारी के लिए उपयुक्त है।
  • योगाभ्यास के बाद शरीर की ऊर्जा को पुनर्संतुलित कर थकान दूर करता है।
  • एकाग्रता, मानसिक स्पष्टता एवं भावनात्मक संतुलन बढ़ाने में सहायक है।
  • गहरी शारीरिक एवं मानसिक शांति का अनुभव कराता है और सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।

किन रोगों / स्थितियों में लाभकारी

  • मानसिक तनाव (Stress), चिंता (Anxiety) एवं डिप्रेशन में विशेष रूप से लाभकारी।
  • अनिद्रा (Insomnia), मानसिक थकान तथा शारीरिक थकावट को कम करने में सहायक।
  • उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) को नियंत्रित करने हेतु प्रभावी विश्राम तकनीक।
  • हृदय रोगियों के लिए मानसिक शांति एवं तनाव कम करने में सहायक।
  • माइग्रेन, तनावजनित सिरदर्द तथा गर्दन और कंधों की जकड़न में लाभकारी।
  • अस्थमा एवं अन्य श्वसन संबंधी विकारों में श्वसन को सामान्य एवं शांत करने में सहायक।
  • पाचन विकार, गैस, एसिडिटी तथा तनाव से संबंधित पेट की समस्याओं में उपयोगी।
  • थकान, अत्यधिक कार्यभार, भावनात्मक असंतुलन तथा योगाभ्यास के बाद रिकवरी के लिए अत्यंत उपयोगी।

निषेध / सावधानियाँ

  • यदि कमर, गर्दन या रीढ़ की हड्डी में गंभीर दर्द या चोट हो तो शरीर के नीचे आवश्यक सहारा (तकिया या रोल) लेकर ही अभ्यास करें।
  • गर्भावस्था, हाल ही में हुई सर्जरी अथवा किसी गंभीर चिकित्सकीय स्थिति में डॉक्टर या योग विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में अभ्यास करें।
  • अभ्यास के दौरान शरीर को जबरदस्ती स्थिर रखने का प्रयास न करें, उसे पूरी तरह स्वाभाविक एवं शिथिल रहने दें।
  • विश्राम की अवस्था से बाहर आते समय अचानक न उठें। धीरे-धीरे करवट लेकर बैठें ताकि चक्कर या असुविधा न हो।
  • यदि अभ्यास के दौरान दर्द, बेचैनी या सांस लेने में कठिनाई महसूस हो तो अभ्यास रोककर विशेषज्ञ से सलाह लें।

Tip

शवासन का वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब शरीर का प्रत्येक भाग पूरी तरह शिथिल हो और मन केवल श्वास तथा शरीर में हो रहे विश्राम के अनुभव पर केंद्रित रहे। अभ्यास के दौरान किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक प्रयास न करें। प्रत्येक श्वास के साथ तनाव को छोड़ें और गहरी शांति, स्थिरता तथा विश्राम का अनुभव करें।

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