हमारा भोजन या तो अच्छे स्वास्थ्य की नींव है, या रोगों की शुरुआत।
फूड-बॉर्न डिज़ीज़ (Foodborne Diseases) शब्द का सामान्यतः प्रयोग उन रोगों के लिए किया जाता है जो बैक्टीरिया, वायरस, परजीवियों, विषैले पदार्थों (टॉक्सिन्स) अथवा हानिकारक रसायनों से दूषित भोजन खाने के कारण उत्पन्न होते हैं। इन्हें सामान्य भाषा में फूड पॉइज़निंग (Food Poisoning) भी कहा जाता है। ऐसे रोग प्रायः त्वरित (Acute) होते हैं तथा अल्पकालिक होते हैं।
किन्तु “गलत भोजन” की अवधारणा केवल दूषित भोजन तक सीमित नहीं है। इसमें केवल क्या खाते हैं ही नहीं, बल्कि कैसे खाते हैं, कब खाते हैं, कितना खाते हैं, कितनी बार खाते हैं, किसके साथ खाते हैं, भोजन करते समय हमारी मानसिक एवं भावनात्मक अवस्था कैसी होती है, भोजन का समय, भोजन को अच्छी तरह चबाना, नींद की आदतें तथा शारीरिक गतिविधियाँ—ये सभी शामिल हैं।
ये सभी कारक हमारी भोजन संबंधी आदतों (Food Behaviour), पाचन क्रिया, चयापचय (Metabolism) तथा दीर्घकालिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
आधुनिक पोषण विज्ञान एवं व्यवहार विज्ञान अब इन जीवनशैली संबंधी कारकों के महत्व को लगातार स्वीकार कर रहे हैं, जबकि आयुर्वेद हजारों वर्षों से इन पर विशेष बल देता आया है। आयुर्वेद द्वारा प्रतिपादित अनेक आहार सिद्धांतों पर प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) भी समान रूप से बल देती है, यद्यपि इन दोनों चिकित्सा पद्धतियों का विकास स्वतंत्र रूप से हुआ है। आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद तथा प्राकृतिक चिकित्सा अलग-अलग शब्दावली का प्रयोग करते हैं, किन्तु अनेक मूलभूत सिद्धांत एवं रोग-प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से काफी हद तक मेल खाती हैं।
आयुर्वेद | प्राकृतिक चिकित्सा | आधुनिक विज्ञान |
मिथ्या आहार | गलत भोजन | अस्वास्थ्यकर आहार |
विरुद्ध आहार | भोजन असंगति | फूड इन्टॉलरेंस, प्रतिकूल खाद्य अंतःक्रियाएँ |
अध्यशन (अधिक भोजन) | अधिक भोजन | आवश्यकता से अधिक कैलोरी सेवन |
विषमाशन (अनियमित भोजन) | गलत खान-पान की आदतें | जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) का असंतुलन |
आम | टॉक्सेमिया | दीर्घकालिक सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, चयापचय विकार |
अग्निमांद्य | कमजोर पाचन | पाचन अक्षमता, डिस्बायोसिस |
दोष असंतुलन | जीवन शक्ति का असंतुलन | शारीरिक एवं चयापचय असंतुलन |
यद्यपि इन तीनों प्रणालियों की भाषा एवं अवधारणायें अलग-अलग हैं, फिर भी दीर्घकालिक रोगों के विकास में आहार की भूमिका को लेकर इन तीनों में उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है।
गलत भोजन से सामान्यतया जुड़े रोग :
- मोटापा
- मधुमेह
- उच्च रक्तचाप
- रक्त में वसा (लिपिड) की अधिकता
- कोरोनरी आर्टरी रोग
- नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर रोग (NAFLD)
- मेटाबोलिक सिंड्रोम
- कब्ज
- अम्लपित्त / एसिड पेप्टिक रोग / GERD
- इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS)
- पित्ताशय की पथरी
- गुर्दे की पथरी
- आर्थराइटिस
- गठिया
- ऑस्टियोपोरोसिस
- दाँतों के रोग
- त्वचा रोग
- माइग्रेन
- खाद्य एलर्जी एवं फूड इन्टॉलरेंस
- पोषण संबंधी कमी के रोग
- कुछ प्रकार के कैंसर
इन रोगों के संबंध में आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और आधुनिक चिकित्सा के बीच समानता का स्तर अलग-अलग है।
वे रोग जिन पर तीनों प्रणालियों में पर्याप्त सहमति है
- मोटापा
- मधुमेह
- उच्च रक्तचाप
- हाइपरलिपिडीमिया
- कोरोनरी आर्टरी रोग
- फैटी लिवर रोग
- कब्ज
- मेटाबोलिक सिंड्रोम
वे रोग जिन पर आंशिक सहमति है
- इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS)
- माइग्रेन
- गठिया एवं आर्थराइटिस
- त्वचा रोग
- एलर्जिक रोग
- पित्ताशय की पथरी
- गुर्दे की पथरी
आधुनिक विज्ञान में अनुसंधान एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। अनेक पारंपरिक अवधारणाओं को आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों का समर्थन प्राप्त हो चुका है, जबकि अन्य विषयों पर अभी भी शोध जारी है।
एक उल्लेखनीय समानता
यद्यपि इन तीनों प्रणालियों का दार्शनिक आधार अलग-अलग है, फिर भी स्वस्थ आहार के संबंध में इनकी अधिकांश सलाह लगभग समान है—
- अधिक मात्रा में ताजे फल खायें ।
- पर्याप्त मात्रा में सब्जियाँ, विशेषकर हरी पत्तेदार सब्जियां खायें ।
- प्राकृतिक एवं पौधों पर आधारित भोजन को प्राथमिकता दें।
- परिष्कृत अनाजों के स्थान पर साबुत अनाज चुनें।
- पर्याप्त मात्रा में आहार रेशा (Dietary Fibre) लें।
- परिष्कृत खाद्य पदार्थों से बचें।
- प्रोसेस्ड एवं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से बचें।
- तले हुए खाद्य पदार्थों से बचें।
- नमक का सेवन सीमित रखें।
- चीनी का सेवन कम करें।
- आवश्यकता से अधिक भोजन न करें।
- नियमित समय पर भोजन करें तथा भोजन को अच्छी तरह चबाकर खाएँ।
- पर्याप्त नींद लें तथा नियमित शारीरिक गतिविधियाँ करें।
निष्कर्ष
मानव शरीर प्रकृति की सबसे अद्भुत एवं जटिल जैविक प्रणालियों में से एक है। यह वर्षों तक दिन-रात, बिना रुके कार्य करता रहता है। इस अद्भुत कार्य को सुचारु रूप से करने के लिए इसे उचित एवं संतुलित पोषण की आवश्यकता होती है, जो केवल हमारे दैनिक भोजन से ही प्राप्त होता है।
दुर्भाग्यवश, अधिकांश लोग शरीर की वास्तविक आवश्यकताओं की अपेक्षा अपनी स्वादेन्द्रियों की संतुष्टि को अधिक महत्व देते हैं। यही असंतुलन धीरे-धीरे अनेक दीर्घकालिक रोगों का कारण बन जाता है।
भोजन केवल स्वाद या आनंद का साधन नहीं है; यह अच्छे स्वास्थ्य की आधारशिला है। आज लिया गया प्रत्येक सही आहार संबंधी निर्णय हमारे दीर्घकालिक स्वास्थ्य में किया गया एक अमूल्य निवेश है।
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