योग के सामान्य सिद्धांत
योग हमारे शरीर, मन, भावनाओं और ऊर्जा के स्तर पर कार्य करता है। इतने स्तरों पर किए गए कार्यों का प्रभाव अनुभव करने के लिए केवल कुछ समय के लिए कोई विशिष्ट मुद्रा साध लेना पर्याप्त नहीं होता बल्कि योग के समस्त साधनों को एक साथ अपनाने की आवश्यकता होती है | यह साधन नीचे बताये गए हैं, पर उन्हें जानने से पहले यह समझना भी ज़रूरी है कि हमारे जीवन में योग का महत्व है ओर यह क्यों आवश्यक है।
आज का युग विज्ञान, तकनीक और आधुनिक सुविधाओं का युग है। मानव ने विकास के नाम पर ऐसे अनेक साधन बना लिए हैं, जिनसे जीवन पहले की अपेक्षा अधिक, बहुत अधिक आरामदायक हो गया है। घर, कार्यालय और यात्रा — हर स्थान पर मशीनें और डिजिटल तकनीक ने शारीरिक श्रम को बहुत कम कर दिया है। किंतु यह सुविधा जितनी लाभदायक दिखाई देती है, उतनी ही बड़ी चुनौती भी अपने साथ लेकर आई है। आरामदायक और गतिहीन (Sedentary) जीवनशैली के कारण अनेक शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक समस्यायें तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे समय में योग केवल एक व्यायाम नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।
प्राचीन भारत में अधिकांश लोग कृषि, पशुपालन तथा अन्य श्रमप्रधान कार्य करते थे। अन्यथा भी दैनिक जीवन में पर्याप्त शारीरिक परिश्रम होने के कारण शरीर स्वाभाविक रूप से सक्रिय रहता था। आज अधिकांश लोग घंटों कुर्सी पर बैठकर कंप्यूटर या मोबाइल पर कार्य करते हैं। लिफ्ट, वाहन, ऑनलाइन सेवायें और मशीनों के कारण पैदल चलना तथा शारीरिक श्रम अत्यन्त कम वल्कि समाप्तप्राय हो गया है। परिणामस्वरूप मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कमर, जोड़ और गर्दन का दर्द, पाचन विकार तथा नींद की समस्यायें तेजी से बढ़ रही हैं।
समस्या केवल शरीर तक सीमित नहीं है। आधुनिक जीवन की तीव्र प्रतिस्पर्धा, कार्य का दबाव, आर्थिक चिंतायें, सोशल मीडिया का प्रभाव तथा निरन्तर स्क्रीन के संपर्क में रहने से तनाव, चिंता, अवसाद, चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान भी बढ़ती जा रही है। मनुष्य के पास सुविधायें तो हैं, किंतु मानसिक शांति का अभाव है।
यहीं योग की वास्तविक आवश्यकता सामने आती है। योग केवल शरीर को मोड़ने-तोड़ने वाले आसनों का नाम नहीं है। “योग” का अर्थ है—शरीर, मन, प्राण और आत्मा का संतुलित समन्वय। महर्षि पतंजलि ने योग को “चित्तवृत्ति निरोध” अर्थात् मन की चंचल वृत्तियों को नियंत्रित करने की विधि बताया है। योग व्यक्ति को केवल रोगमुक्त ही नहीं बनाता, बल्कि उसे संतुलित, जागरूक और आत्मविश्वासी भी बनाता है।
योगासन शरीर की मांसपेशियों, जोड़ों और मेरुदंड को लचीला एवं मजबूत बनाते हैं। नियमित अभ्यास से रक्त संचार सुधरता है, पाचन क्रिया बेहतर होती है, शरीर की कार्यक्षमता बढ़ती है तथा मोटापे पर नियंत्रण रखने में सहायता मिलती है। प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाकर शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन उपलब्ध कराता है और तनाव कम करने में सहायक होता है। ध्यान (Meditation) मन को शांत करता है, एकाग्रता बढ़ाता है तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है। इसके नियमित अभ्यास से कार्य क्षमता बढ़ती है जिससे कम समय में अधिक कार्य सम्पन्न हो जाता है और इस प्रकार इसमें लगाये गये समय की क्षतिपूर्ती हो जाती है ।
योग के साधन हैं :—
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, बंध, मुद्रा, षट्कर्म, युक्ताहार, मंत्र – जप, युक्त-कर्म आदि।
- यम और नियम
अर्थात संयम और नियम। ये दोनों योग से लाभ प्राप्ति के लिए आवश्यक पूर्व-शर्त हैं, जिनका पालन किये बिना योग का उचित लाभ नहीं मिल सकता । सामान्य जीवन में भी इनका महत्व हम सभी जानते ही हैं । - आसन
आसन शरीर और मन में स्थिरता लाने के साधन हैं। - प्राणायाम
- ‘प्राणायाम’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — प्राण अर्थात् जीवन शक्ति या जीवन ऊर्जा तथा आयाम अर्थात् विस्तार, नियंत्रण या संतुलित संचालन। प्राणायाम श्वास को नियंत्रित एवं व्यवस्थित करने की वैज्ञानिक योगिक विधि है, जिसके माध्यम से शरीर, मन, प्राण और तंत्रिका तंत्र (Nervous System) में संतुलन स्थापित होकर समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है।
आधुनिक विकास ने हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाने के साथ साथ शारीरिक निष्क्रियता, मानसिक तनाव, अनियमित श्वसन तथा जीवनशैली संबंधी रोगों को भी बढ़ावा दिया है। प्राणायाम इन सभी समस्याओं का प्राकृतिक, सरल और वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करता है।
प्रत्याहार
इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर ले जाना प्रत्याहार कहलाता है।
- धारणा
मन और शरीर के भीतर ध्यान को केंद्रित करना धारणा है। - ध्यान और समाधि
ध्यान (मेडिटेशन) गहन एकाग्रता है और समाधि स्थिर, निरंतर चेतना की अवस्था है। ध्यान सामान्य मनुष्य के लिए भी उपयोगी और साध्य है जबकि समाधि गहन आध्यात्मिक विषय है और हमारे रोग एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी विषय के लिए अप्रासंगिक सा हो जाता है । - बंध और मुद्रा
बंध और मुद्रा प्राणायाम से जुड़े उच्च स्तर के अभ्यास हैं, जो शारीरिक मुद्राओं और श्वास नियंत्रण के माध्यम से मन को नियंत्रित करते हैं; और पांच मूलभूत प्राकृतिक तत्वों (पान्चमहाभूत) को भी नियंत्रित करते हैं । - षट्कर्म
षट्कर्म शरीर को शुद्ध करने की क्रियाएं हैं, जो शरीर में जमा विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालती हैं। - युक्ताहार
स्वस्थ अवस्था में स्वस्थ बने रहने और रोग अवस्था में व्याधि दूर करने में सहायक आहार-विहार युक्ताहार कहलाता है। - मंत्र-जप
मंत्र-जप किसी मंत्र या दिव्य चेतना का ध्यानपूर्वक बार-बार उच्चारण है, जो मानसिक शांति और तनाव मुक्ति में सहायक होता है।
