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इस लेख का उद्देश्य किसी भी प्रकार का  भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि उचित आहार-संयोजन (Food Compatibility) पर प्रकाश डालना है जिसके आदतन अनुकरण से न केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) स्वतः बढ़ती है बल्कि दीघ्रकालिक रोगों से बचाव भी होता है |

हमारे स्वास्थ्य और भोजन में कितना गहरा सम्बन्ध है इस सम्बन्ध में लोलिम्बराज आयुर्वेद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘वैद्यजीवन’ में लिखा है  :- 

पथ्ये सति गदारत्स्य किमूषधनिशेवनाः। 

पथयेऽसति गदार्तस्य किमुषधनिशेवनाः॥ 

1. जिसका अर्थ है यदि कोई रोगी आहार (नियमों और उचित आहार) का पालन कर रहा है , तो उसे किसी भी प्रकार की दवा लेने की आवश्यकता नहीं है। यदि कोई रोगी नियमित आहार का पालन नहीं करता है , तो कोई भी दवा लेने से कोई लाभ नहीं होता है, क्योंकि जब तक भोजन सही नहीं होगा, दवा काम नहीं करेगी। 

अतः आयुर्वेद के अनुसार, उचित आहार और संयम ही रोग के उपचार की पहली और मुख्य औषधि है । सुश्रुत सहिंता सूत्रस्थान अ. 1 में बताया है कि आहार जीवों की शक्ति, रंग, और ओज की जड़ है तथा चार प्रकार की व्याधि बताकर उनको दूर करने के जो चार साधन बताये हैं उनमें आहार को जड़ बताकर मुख्य स्थान दिया है; और यह भी कहा है कि दोष व  रोग जानने वाला वैद्य रोगी को केवल पथ्य दे कर ही आराम कर देता है।  आयुर्वेद और चिकित्सा में “पथ्य” शब्द  का प्रयोग उस  मार्ग या आहार के लिए किया जाता है जो शरीर के लिए लाभकारी होता है, जल्दी पचता है और रोग को ठीक करने या उससे उबरने में मदद करता है।

आयुर्वेद का प्रसिद्ध सिद्धांत है:

“हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्”

अर्थात् जो व्यक्ति हितकर (उपयुक्त), मित (उचित मात्रा में) और ऋतु के अनुसार भोजन करता है, वह सामान्यतः स्वस्थ रहता है।

आयुर्वेद में विरुद्ध आहार का विषय अत्यन्त व्यापक और व्यावहारिक है। यदि इसका सार एक वाक्य में कहा जाए, तो—

“केवल क्या खाया जाए यह ही नहीं, बल्कि कब, कितना, किसके साथ, किस ऋतु में, किस प्रकृति वाले व्यक्ति द्वारा और किस प्रकार खाया जाए—यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।”

चरक के अनुसार विरुद्ध आहार का निरन्तर सेवन निम्न व्याधियों का कारण बनता है—

• अग्निमांद्य (पाचन शक्ति की कमजोरी) 

• आम निर्माण – टॉक्सिक अवशेष का निर्माण (जो शरीर में ही रह जाता है)  

• त्वचा रोग 

• एलर्जी एवं खुजली 

• रक्तदूष्टि 

• संधि रोग  (जोड़ों के रोग – आर्थराइटिस , गठिया इत्यादि 

• मोटापा 

• मधुमेह की प्रवृत्ति 

• प्रतिरक्षा शक्ति में कमी 

आयुर्वेद में “विषम भोजन” (असंगत, अनुचित या शरीर की प्रकृति एवं पाचन-शक्ति के विपरीत भोजन) को अनेक रोगों का कारण माना गया है। विशेष रूप से चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदयम् में इसके 18 प्रकार के रूपों का वर्णन मिलता है, जो इस प्रकार है :- 

क्रमांक प्रकार विवरण / उदहारण

1 मात्रा-विषम 

(अनुचित मात्रा में भोजन)

1. आवश्यकता से अधिक खाना 

2. आवश्यकता से कम खाना 

3. भूख न होने पर खाना 

2 काल-विषम 

(अनुचित समय पर भोजन)

• ग्रीष्म ऋतु में अत्यधिक मिर्च-मसाला 

• शीत ऋतु में अत्यधिक शीतल पेय

• रात्रि में दही 

• वर्षा ऋतु में कच्ची पत्तेदार सब्जियाँ 

• दोपहर की तीव्र गर्मी में भारी भोजन 

3 संयोजन-विषम 

(विरुद्ध आहार) दो ऐसे पदार्थों का साथ सेवन जो परस्पर असंगत माने गए हैं।

4 संस्कार-विषम 

(गलत प्रसंस्करण) • शहद को गर्म करना

• बार-बार गर्म किया घी / तेल

• माइक्रोवेव में गरम भोजन (आयुर्वेदिक दृष्टि से संस्कार परिवर्तन का उदाहरण माना जा सकता है)

5 देश-विषम

स्थान और जलवायु के प्रतिकूल भोजन • राजस्थान जैसे शुष्क प्रदेश में अत्यधिक तीखा, सूखा भोजन

• अत्यधिक गर्म प्रदेश में अधिक तले-भुने पदार्थ

• आर्द्र प्रदेश में अधिक दही, मिठाई

6 प्रकृति-विषम

अपनी शारीरिक प्रकृति (वात, पित्त, कफ) के विरुद्ध भोजन।

• वात प्रकृति वाले व्यक्ति द्वारा सूखा भोजन , अधिक उपवास 

• पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति द्वारा अत्यधिक मिर्च-मसाले 

• कफ प्रकृति वाले व्यक्ति द्वारा अत्यधिक मिठाई एवं दुग्ध पदार्थ

7 अवस्था-विषम

शरीर की वर्तमान अवस्था के विपरीत भोजन उदाहरण:

• ज्वर में भारी या अन्न का भोजन 

• धूप से आने पर बर्फीला पानी 

• जागरण के बाद कफवर्धक भोजन 

• अधिक थकान के बाद भारी तला भोजन

8 क्रम-विषम

भोजन करने की अनुचित विधि। • भोजन के अंत में भारी मिठाई

• भोजन से पहले अधिक पानी 

• भोजन के तुरंत बाद फल 

• पहले दही फिर दूध

9 अग्नि विरुद्ध

पाचन शक्ति के विपरीत भोजन • मंदाग्नि में भारी भोजन 

• तीव्र अग्नि में अत्यल्प भोजन 

• अपच रहते हुए पुनः भोजन 

• भूख न होने पर भोजन

10 सात्म्य विरुद्ध

जिस भोजन की आदत न हो, उसका अचानक सेवन • शाकाहारी द्वारा अचानक  मांसाहार 

• कम मसाले खाने वाले व्यक्ति द्वारा अत्यधिक मसालेदार भोजन

• दूध न पचने वाले व्यक्ति का अधिक दूध सेवन 

11 वीर्य विरुद्ध

उष्ण और शीत गुणों के  विरोध वाला भोजन • दूध + खट्टे फल , या मांसाहार 

• गर्म भोजन + आइसक्रीम 

• गर्म चाय के साथ ठंडा पेय 

12 कोष्ठ विरुद्ध     

मल प्रवृत्ति के अनुसार अनुपयुक्त भोजन • कब्ज वाले व्यक्ति का अत्यधिक सूखा भोजन

• ढीले पेट वाले व्यक्ति का अधिक दूध सेवन

13 परिहार विरुद्ध

किसी आहार के बाद आवश्यक नियम का पालन न करना • घी खाने के बाद तुरंत ठंडा पानी

• धूप से आकर बर्फीला पानी

• व्यायाम के तुरंत बाद ठंडा स्नान

14 उपचार विरुद्ध

रोगावस्था के विपरीत भोजन • ज्वर में भारी या अन्न का भोजन 

• मोटापे में मिठाई 

• मधुमेह में मीठा

• कफ रोग में दही

15 पाक विरुद्ध

गलत प्रकार से पकाया गया भोजन • अधपका भोजन 

• जला भोजन।

• अत्यधिक तला भोजन 

• बार-बार गर्म किया भोजन

16 हृदय विरुद्ध

जो मन को अप्रिय लगे। • घृणा उत्पन्न करने वाला भोजन

• तनाव में भोजन

17 सम्पद विरुद्ध

भोजन की गुणवत्ता के दोष वाला भोजन • बासी भोजन

• सड़ा भोजन 

• दूषित भोजन

• कीटनाशक युक्त भोजन 

18 विधि विरुद्ध

भोजन करने की गलत विधि • जल्दी-जल्दी खाना 

• बात करते हुए खाना 

• खड़े होकर खाना

• चलते हुए खाना

सामान्य रूप से उपरोक्त लगभग सभी प्रकार के विषम या विरुद्ध आहार स्पष्ट हैं किन्तु  संयोजन-विषम (विरुद्ध आहार) की थोड़े विस्तार में चर्चा आवश्यक है | आयुर्वेद के मतानुसार कुछ प्रकार के भोजन का एक साथ सेवन निषिद्ध है | इस प्रकार के कुछ भोजन इस प्रकार हैं : 

दूध के साथ विरुद्ध संयोजन

संयोजन आयुर्वेदिक कारण

दूध + मछली उष्ण-शीत एवं गुण-विरोध

दूध + दही विपरीत पाचन प्रक्रिया

दूध + नमक रक्त व त्वचा विकार कारक

दूध + खट्टे फल दूध फटता है, आम उत्पन्न

दूध + नींबू पाचन बाधित

दूध + इमली वीर्य-विरोध

दूध + संतरा/मौसमी कफ वृद्धि

दूध + केला भारी, कफकारक

दूध + खरबूजा पाचन में विरोध

दूध + तरबूज जठराग्नि मंद

दूध + कटहल गुरु एवं आमजनक

दूध + मूली त्वचा विकार सम्भावना

दूध + लहसुन गुण-विरोध

दूध + प्याज पाचन विकार

दूध + कुल्थी दाल विरुद्ध संयोजन

दूध + उड़द दाल अत्यधिक गुरु

दूध + खमीरयुक्त पदार्थ पाचन बाधित

दूध + सिरका विरुद्ध

दही के साथ विरुद्ध संयोजन

संयोजन कारण

दही + गरम भोजन पित्त वृद्धि

दही + दूध विरुद्ध

दही + मछली त्वचा रोग सम्भावना

दही + खरबूजा आमजनक

दही + केला कफ वृद्धि

दही + खीरा (अधिक मात्रा में) पाचन विकार

दही + रात में सेवन कफ वृद्धि

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मधु (शहद) से संबंधित विरुद्ध संयोजन

संयोजन कारण

शहद + घी समान मात्रा में चरक अनुसार विषतुल्य

गरम शहद विषवत् माना गया

शहद को पकाना संस्कार विरुद्ध

शहद + अत्यधिक गरम पेय गुण नष्ट

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फल-संबंधी विरुद्ध संयोजन

संयोजन कारण

खरबूजा + अन्य भोजन अलग पाचन गति

तरबूज + भोजन के तुरंत बाद पाचन बाधा

फल + भारी भोजन आम निर्माण

खट्टे फल + स्टार्चयुक्त भारी भोजन किण्वन

खट्टे फल + दूध विरुद्ध

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घी, तेल एवं वसा सम्बन्धी विरुद्ध संयोजन

संयोजन कारण

समान मात्रा में मधु व घी विषतुल्य

बार-बार गर्म किया हुआ घी संस्कार विरुद्ध

अत्यधिक गर्म तेल में बार-बार तला भोजन आमजनक

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कुछ अन्य प्रसिद्ध विरुद्ध संयोजन

संयोजन कारण

मछली + गुड़ विरुद्ध

मछली + दूध विरुद्ध

मूली + गुड़ दोष वृद्धि

मूली + दूध त्वचा रोग सम्भावना

उड़द + मूली भारी

गर्म पेय + शहद विरुद्ध

भोजन के साथ बहुत ठंडा पानी अग्निमांद्य

गरम भोजन के तुरंत बाद आइसक्रीम अग्नि विकार

समान मात्रा में जल और शहद का विशेष मिश्रण कुछ ग्रंथों में निषिद्ध

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आयुर्वेद में अनुकूल (हितकर) संयोजन

संयोजन लाभ

दूध + हल्दी रसायन

दूध + खजूर बलवर्धक

दूध + घी (उचित मात्रा में) ओजवर्धक

मूंग दाल + चावल सुपाच्य

घी + गर्म भोजन अग्निदीपक

दही + सैंधव नमक (दिन में) पाचन सहायक

आंवला + शहद रसायन

अदरक + सैंधव दीपनीय

भोजन सम्बन्धी कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें :

• अखरोट, मूंगफली या  सिंघाड़े में मांस, अंडे और पनीर से अधिक ताकत होती है ।

• जामुन में ताबे का नमक और केला, आम, तथा पालक में लोहे को  प्रकृति ने सम्मलित कर दिया है।

• कचनार की कलियों में चांदी का अंश और चौलाई में सोने का अंश मिला हुआ है । 

• वथुआ के साग में खार बहुत कम होता है, इसे यदि एक तोला (11.7 Gram) कच्चा सुबह खाली पेट खा लिया जाये तो 40 दिनों में मुद्दतों का गठिया व जोड़ों का दर्द चला जाएगा ।

• चावल और तरवूज साथ साथ खाना – दस्त (Loose Motion) को आमंत्रण देने के सामान है।

• घर से बाहर रेस्टोरेंट आदि में भोजन करते समय दही का सेवन अवश्य करें। यह एक प्राकृतिक प्रोबायोटिक है, इसमें मौजूद अच्छे बैक्टीरिया भोजन को पचाने में मदद करते हैं ; पेट के एसिड को संतुलित करता है और मसालेदार भोजन से होने वाली पेट की जलन को शांत करता है।

नोट:

उपरोक्त सिद्धांत आयुर्वेद के पारंपरिक पाचन-विज्ञान, दोषों, वीर्य (उष्ण–शीत प्रकृति) तथा आहार-संगतता (Food Compatibility) की अवधारणाओं पर आधारित हैं। आधुनिक पोषण विज्ञान इनमें से कुछ बातों का समर्थन करता है, जैसे बार-बार गरम किए गए तेलों का सेवन न करना, अतिभोजन से बचना तथा निम्न गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों से परहेज़ करना। वहीं कुछ अन्य सिद्धांत मुख्यतः आयुर्वेदिक परंपरा पर आधारित हैं।

फिर भी, समग्र दृष्टि से देखा जाए तो आहार एवं स्वास्थ्य के संबंध में आयुर्वेद की अवधारणाएँ अत्यंत व्यापक एवं गहन हैं। आधुनिक पोषण विज्ञान जहाँ मुख्यतः भोजन के पोषक तत्त्वों (Nutrients) के विश्लेषण तक सीमित रहता है, वहीं आयुर्वेद भोजन के गुण, मात्रा, संयोजन, सेवन का समय, पाचन-शक्ति, प्रकृति, ऋतु तथा व्यक्ति-विशेष की आवश्यकताओं को भी समान महत्त्व देता है। इस कारण भोजन और स्वास्थ्य के परस्पर संबंधों की जो गहराई आयुर्वेद प्रस्तुत करता है, वह आधुनिक पोषण विज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत एवं समग्र मानी जाती है।

Sir Robert McCarrison 1878 – 1960 )  जो भारत में पोषण अनुसंधान के जनक माने जाते हैं, उन्होंने 1918 में कुन्नूर (तमिलनाडु) में भोज्य पदार्थों की जांच इकाई की स्थापना की थी, जो आज  ICMR- INDIAN COUNCIL OF MEDICAL RESEARCH  के रूप में कार्यरत है ।

मैककैरिसन ने जब भारतीय भोज्य पदार्थों में पोषण तत्वों के अन्वेषण और परीक्षण किए तब वह इस बात पर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहते हैं  भारतीय आहार शास्त्रियों को पोषक तत्वों के संतुलन का इतना वैज्ञानिक, इतना विवेचनात्मक, और इतना उत्तम ज्ञान और वह भी अब से शताव्दियों पूर्व कैसे था ? जिसमें आधुनिक वैज्ञानिक कोई नई बात नहीं जोड़ पाते हैं ;  हां अपने नित्य के नवीन प्रयोगों द्वारा उन्हीं के सिधान्तों की परिपुष्टि तथा उनके नियमों की सिद्धि दिन प्रतिदिन अवश्य करते जाते हैं ।  उनकी यह धारणा इस कारण बनी कि आहार के सम्बन्ध में जो बिचार उन्होंने बीसों वर्ष के परीक्षण के बाद संसार को दिये, बे ही सिधान्त लोलिम्बराज ने शताब्दियों पूर्व बताये औए वे ही सिधान्त महर्षि आत्रेय (ईसा से लगभग एक हज़ार साल पहले) ने हज़ारों साल पहले घोषित किए , जिनका वर्णन चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदयम् आदि में मिलता है और जिनकी रचना ईसा से लगभग एक हज़ार साल पहले की गई थी ।

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