आधुनिक विज्ञान और प्राचीनतम आयुर्वेद में समानता
“पिछली शताब्दी में, भोजन और पोषण विज्ञान ने जबरदस्त प्रगति की है। कई वैज्ञानिकों ने समय समय पर इस सम्बन्ध में अनेकों शोध कार्य किए और कई वर्षों के अथक परिश्रम से किए शोध के आधार पर भोजन और पोषण सम्बन्धी अनेकों सिधान्त प्रतिपादित किए | निसन्देह हम इन सभी वैज्ञानिकों के आभारी है जिनके किए गए शोध कार्य चिकित्सा जगत में अविस्यमरणीय रहेंगे | हां इन वैज्ञानिकों के साथ साथ हम अपने देश के उन ऋषि, मुनियों के भी ऋणी हैं जिन्होंने इन वैज्ञानिकों से हजारों वर्ष पहले ही किसी न किसी रूप में इन सिधान्तों से हमें अवगत करा दिया था | आहार, पाचन, भोजन संयोजन, भोजन के समय और जीवन शैली के बारे में आयुर्वेद के कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा पूर्ण रूप से समर्थन किया गया है। उल्लेखनीय रूप से, पिछली शताब्दी में पोषण विज्ञान में भारी प्रगति के बावजूद, किसी भी मौलिक वैज्ञानिक खोज ने मूल आयुर्वेदिक अवधारणा को अमान्य नहीं किया है कि उचित भोजन स्वास्थ्य का प्राथमिक निर्धारक है।
यह भी स्मरणीय है कि अष्टांग ह्रदयम की रचना तो छठी, सातवीं इस्वी के बीच आचार्य वाग्भट द्वारा की गई जब कि आयुर्वेद के प्राचीनतम मूल ग्रन्थ सुशुत सहिंता, चरक सहिंता, की रचना ईसा से लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व की मानी जाती है और वही आयुर्वेद का आधार भी माना जाता है।
एक और बहुत बल्कि शायद अधिक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि आधुनिक पोषण विज्ञान मुख्यतः पोषक तत्वों (Nutrients) की मात्रा पर केंद्रित है, जबकि आयुर्वेद केवल पोषक तत्वों की उपस्थिति को पर्याप्त नहीं मानता। आयुर्वेद के अनुसार भोजन का रस, गुण, वीर्य, विपाक, पाचन शक्ति (अग्नि), मात्रा, समय, ऋतु तथा भोजन-संयोजन (विरुद्ध आहार) भी स्वास्थ्य के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। इसलिए केवल आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति कर लेना पर्याप्त नहीं है; उनका उचित पाचन, अवशोषण और शरीर द्वारा समुचित उपयोग भी उतना ही आवश्यक है। वास्तव में यही वह बिन्दु है जहाँ आयुर्वेद आधुनिक पोषण विज्ञान से कहीं अधिक व्यापक और गहन दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। आधुनिक विज्ञान मुख्यतः यह बताता है कि भोजन में कौन-कौन से पोषक तत्व हैं, जबकि आयुर्वेद यह भी बताता है कि वही भोजन किस व्यक्ति, किस ऋतु, किस समय, किस मात्रा और किस अवस्था में हितकारी अथवा अहितकारी होगा।
भोजन और पोषण सम्बन्धी आधुनिक विज्ञान और प्राचीन आयुर्वेदिक विज्ञान में क्या अंतर है यह तो अपने आप में एक विस्तृत विषय है । अतः इस विषय में किसी अन्य लेख में चर्चा करेंगे । इस लेख में जैसा कि इसके शीर्षक से ही विदित है, हम इस दोनों की समानताओं का विचार करते हैं ।
- सर रॉबर्ट मैककैरिसन (1878-1960) ने 1927 में कुन्नूर (तमिलनाडु) में पोषण अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना करके लगभग 30 साल तक पोषण पर शोध किया । उनके द्वारा प्रतिस्थापित यह संस्था आज भी ICMR (इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च) के नाम से कार्यरत है उनकी शोध का प्रसिद्ध निष्कर्ष था : “दोष हमारे जीन्स में नहीं है, बल्कि हमारे भोजन में है। उन्होंने पाया कि प्राकृतिक संपूर्ण खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य बनाए रखते हैं जबकि परिष्कृत आहार रोग पैदा करते हैं; आहार लगभग हर अंग को प्रभावित करता है । उनका यह अवलोकन आयुर्वेदिक सिद्धांतों के विल्कुल समान है, जिसकी चर्चा हम अपने पिछले लेख में कर चुके हैं।
- वेस्टन ए मूल्य प्राइस (1870 – 1948 ) ने अलग-अलग देशों की पारंपरिक आबादी का अध्ययन करते हुए दुनिया भर की यात्रा की। उन्होंने पाया कि अपना पारंपरिक आहार खाने वाले लोगों के दांत उत्कृष्ट थे , हड्डियां मजबूत थीं और यदि कोई बीमारी थी भी तो वह छोटी मोटी थी; किन्तु जब उनके आहार में परिष्कृत खाद्य पदार्थ शामिल हुए, उनके दांतों की सड़न बढ़ गई , मधुमेह होने लगा , मोटापा बढ़ा और गम्भीर बीमारियां होने लगीं । उनकी क्लासिक पुस्तक “न्यूट्रीशन एंड फिजिकल डिजनरेशन” आयुर्वेद के प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर बताये गये प्राचीन सिधान्तों का जोरदार समर्थन करते हैं ।
- डेनहम हरमन (1916 – 2014) ने फ्री रेडिकल थ्योरी ऑफ़ एजिंग के सिद्धांत को प्रस्थापित किया। जिसके अनुसार मुक्त कण स्थिरता प्राप्त करने के लिए, हमारे शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं से जुड़ जाते हैं और उनके आवश्यक तत्वों को नष्ट करते रहते हैं, जिससे आयु बढ़ने के लक्षण प्रकट होने लगते हैं । ये अणु शरीर की भोजन को ऊर्जा में परिवर्तित करने की प्राकृतिक प्रक्रिया के दौरान बनते हैं। इसके अलावा, धूम्रपान, प्रदूषण और सूर्य के प्रकाश की कमी जैसे बाहरी कारक भी शरीर में मुक्त कणों का उत्पादन करते हैं। एंटीऑक्सीडेंट्स विटामिन सी और विटामिन ई ऐसे रक्षक होते हैं जो फ्री रेडिकल्स को बेअसर करते हैं। स्वस्थ आहार और व्यायाम से शरीर में मुक्त कणों से होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है। आयुर्वेद ने लंबे समय से पौष्टिक आहार, एंटीऑक्सिडेंट, जड़ी-बूटियों और रसायन चिकित्सा के माध्यम से इस अध: पतन को रोकने पर जोर दिया है। आधुनिक एंटीऑक्सीडेंट अनुसंधान इस अवधारणा के विल्कुल समानांतर है।
- डेविड बार्कर (1938 – 2013) स्वास्थ्य और रोग की विकासात्मक उत्पत्ति (DOHaD) परिकल्पना के संस्थापक थे । उन्होंने बताया कि मातृ पोषण दशकों बाद बीमारियों को प्रभावित करता है। आयुर्वेद में भी इसी बात पर जोर देते हुए गर्भिणी परिचर्या, मातृ आहार, भ्रूण पोषण का सम्पूर्ण विवरण दिया है ।
- वाल्टर विलेट(1945 – present) हार्वर्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ में 1980 में प्रोफेसर हैं । उन्होंने महामारी विज्ञान के विस्तृत अध्ययनों से पता लगाया कि साबुत अनाज, फल, सब्जियां, नट (अखरोट, बादाम आदि मेवा), और स्वास्थ्यप्रद तेल पुरानी बीमारी को कम करते हैं । यह निष्कर्ष मोटे तौर पर ताजा, पौष्टिक खाद्य पदार्थों के पक्ष में आयुर्वेदिक सिफारिशों के साथ पूर्णतया संरेखित होते हैं।
- माइकल पोलन (1955 – present) हालांकि एक प्रयोगशाला वैज्ञानिक नहीं है, पर उन्होंने हजारों पोषण अध्ययनों को संक्षेप में प्रस्तुत किया। उनकी प्रसिद्ध सलाह: “खाना खाओ, बहुत ज्यादा नहीं, ज्यादातर पौधे। यह आयुर्वेदिक आहार संयम जैसा ही है।
- टिम स्पेक्टर (1958 – present) एक ब्रिटिश महामारी विज्ञानी, चिकित्सा चिकित्सक और विज्ञान लेखक, पोषण, आंत माइक्रोबायोम और स्वास्थ्य के बीच संबंधों पर काम कर रहे हैं। उनके माइक्रोबायोम शोध से पता चलता है कि विविध प्राकृतिक खाद्य पदार्थ, किण्वित (Fermented) खाद्य पदार्थ, और फाइबर युक्त आहार, स्वास्थ्य में सुधार करता है । आयुर्वेद ने बहुत प्राचीन समय से पाचन और आंत के स्वास्थ्य के लिए इसी प्रकार के आहार पर जोर दिया है।
- वाल्टर (1967 – Present) एक इटालवी-अमेरिकी बायोजेरोन्टोलॉजिस्ट और सेल बायोलॉजिस्ट हैं, जिन्हें सेलुलर संरक्षण, उम्र बढ़ने और बीमारियों पर उपवास और पोषक तत्व का जीन्स की प्रतिक्रिया भूमिका पर अपने अध्ययन के लिए जाना जाता है, वर्तमान में यूएससी डेविस स्कूल ऑफ जेरोन्टोलॉजी में प्रोफेसर हैं, साथ ही जैविक विज्ञान विभाग में संयुक्त नियुक्ति के साथ-साथ यूएससी दीर्घायु संस्थान के निदेशक के रूप में भी सेवारत हैं। उनकी उपवास, और आवधिक कैलोरी प्रतिबंध (सप्ताह के कुछ निश्चित दिनों में अपने भोजन में कैलोरी की मात्रा को बहुत कम करना) का दीर्घ आयु से सम्बंध आयुर्वेद में वर्णित उपवास और लंघाना (अल्पाहार) के विल्कुल समरूप ही है ।
- सच्चिन पांडा (1971 – Present) साल्क इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकल स्टडीज में एक भारतीय- अमेरिकी क्रोनोबायोलॉजिस्ट हैं, जिन्होंने सर्कैडियन बायोलॉजी में काम किया है। उनके काम में मेलानोप्सिन-मध्यस्थता प्रकाश संवेदन और समय-प्रतिबंधित भोजन (टीआरई) पर अध्ययन शामिल हैं, जिसे आंतरायिक उपवास भी कहा जाता है। पांडा ने आंखों में मेलानोप्सिन पर शोध किया, जो स्तनधारी सर्कैडियन घड़ी को विनियमित करने में एक घटक है। हाल ही में, उनकी प्रयोगशाला ने चयापचय और समग्र स्वास्थ्य पर सर्कैडियन लय और टीआरई के प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया है। उनका शोध “समय-प्रतिबंधित भोजन” यह दर्शाता है कि सर्कैडियन लय के अनुसार खाने से चयापचय में सुधार होता है। आयुर्वेद ने हजारों वर्षों से सर्कैडियन लय के अनुरूप भोजन के समय पर जोर दिया है ।
- 1 मार्क मैटसन (1957 – Present) एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट हैं जो जॉन्स हॉपकिन्स स्कूल ऑफ मेडिसिन में तंत्रिका विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं। उनका शोध मोटापा, मधुमेह, और न्यूरोडीजेनेरेशन पर आंतरायिक उपवास के लाभों को दर्शाता है । यह शोध भी आयुर्वेदिक उपवास सिद्धांतों की पुष्टि करता है।
- आंत माइक्रोबायोम का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिक आधुनिक माइक्रोबायोम विज्ञान पाचन स्वास्थ्य पर आयुर्वेदिक जोर के साथ तेजी से सुसंगत है। उदाहरणों में शामिल हैं :
a. 1973 में जन्मे डॉ. जस्टिन सोननबर्ग स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में माइक्रोबायोलॉजी और इम्यूनोलॉजी के सक्रिय प्रोफेसर हैं, और आंतों के स्वास्थ्य पर शोधरत हैं।
b. 1976 में न्यूजीलैंड में जन्में डॉ. जे. रॉब नाइट एक प्रसिद्ध कम्प्यूटेशनल जीवविज्ञानी और सूक्ष्मजीवविज्ञानी हैं। वर्तमान में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो (यूसीएसडी) में प्रोफेसर हैं। वे माइक्रोबायोम इनोवेशन सेंटर के संस्थापक निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। वे कम्प्यूटेशनल माइक्रोबायोलॉजी में अपने कार्यों और ह्यूमन माइक्रोबायोम प्रोजेक्ट जैसी प्रमुख वैज्ञानिक पहलों में अपनी भूमिका के लिए जाने जाते हैं।
c. 1947 में जन्मे जेफरी गॉर्डन एक प्रसिद्ध अमेरिकी जीवविज्ञानी और चिकित्सा चिकित्सक हैं । पेट के बैक्टीरिया मानव स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करते हैं, इस पर उनके अद्भुत शोध के कारण लोग उन्हें “आंत माइक्रोबायोम का जनक” कहते हैं ।
इन सभी की शोध इस बात पर जोर देती है कि आंत के रोगाणु आहार से गहराई से प्रभावित होते हैं। आयुर्वेद ने भी इस अवधारणा को अग्नि, पाचन और स्वस्थ बनाम अस्वास्थ्यकर चयापचय उत्पादों के उत्पादन के माध्यम से व्यक्त किया है ।
इस प्रकार कई आधुनिक खोजों – जैसे कि संपूर्ण खाद्य पदार्थों का महत्व, भोजन का समय, उपवास, आंत का स्वास्थ्य, सर्कैडियन लय और मातृ पोषण – ने हजारों साल पहले आयुर्वेद में वर्णित सिद्धांतों के साथ समानताएं दिखाई हैं। केंद्रीय आयुर्वेदिक दृष्टिकोण कि उपयुक्त भोजन स्वास्थ्य की नींव है, जिसे समकालीन वैज्ञानिक प्रमाणों द्वारा भी बार-बार स्थापित किया गया है।

