अंतःस्त्रावी तंत्र के रोग
अंतःस्त्रावी तंत्र के रोग
अंतः स्त्रावी तंत्र ऐसे हार्मोन जारी करता है जो शरीर के विकास और कार्यो को प्रभावित करते हैं अंतःस्त्रावी तंत्र की कोई भी खराबी आनुवंशिकी, संक्रमण या अन्य कारकों के कारण हो सकती है, और इसके परिणामरूवरूप मधुमेह, हाइपरथायरायडिज्म, विकास संबंधी विकार, यौन रोग, पॉलीसिस्टिक डिम्बग्रंथि सिंड्रोम (पीसीओएस) आदि जैसे विभिन्न विकार हो सकते है।
अंतःस्त्रावी ग्रंथियों में शामिल हैः
- पिटयूटरी ग्रंथि : यह मस्तिष्क के आधार पर नाक के पुल के पीछे और हाइपोथैलेमस के ठीक नीचे स्थित होती है। यह स्फेनोइड हड्डी में एक इंडेंट में बैठती है। जिसे सेला टार्किका कहा जाता हैं इसके कार्य हड्डीयों की वृद्धि, महिला मासिक धर्म च्रक और स्तन दूध का स्त्राव हैं। इसका थायरॉयड ग्रंथि पर भी प्रभाव प्रड़ता है।
- हाइपोथैलेमस : यह निचले मध्य मस्तिष्क का एक हिस्सा हैं यह पिटयूटरी ग्रंथि को बताता है कि कब हार्मोन जारी करना है।
- पीनियल ग्रंथि : यह मस्तिष्क के केंद्र के पास होती है। यह नींद के पैटर्न से संबंधित है।
- थायरॉयड : यह ग्रंथि गर्दन में स्थित तितली के आकार की होती है। यह थायरोक्सिन (T4) और ट्राईआयेडोथायोनिन (T3) सहित हार्मोन का उत्पादन करती है जो शरीर में चयापचय, वृद्धि और विकास और आयोडीन होमियोस्टेसिस को नियंत्रित करती हैं।
- पैराथाइरॉइड : ये चार प्रकार के होते है, गर्दन में स्थित होते हैं और हड्डियों के विकास में भूमिका निभाते हैं।
- थाइमस : यह छाती के ऊपरी हिस्से में ब्रेस्टबोन के ठीक नीचे और फेफड़ों के बीच में स्थित होते हैं। यह लसीका तंत्र का भी एक हिस्सा है। इस ग्रंथि के कई कार्य हैं जैसे कि थाइमोसिन, थाइमुलिन, थाइमिक हयूमरल फैक्टर और थाइमोपोइटिन हार्मोन का उत्पादन करके टी कोशिकाओं (जो संक्रमण और बीमारी से लड़ने में मदद करने वाली श्वेत रक्त कोशिकाएं हैं) का उत्पादन और परिपक्ता करना।
- अग्न्याश में आइलेट कोशिकाएं : अग्न्याशय में ये कोशिकाएं इंसुलिन और ग्लूकोजन के स्त्राव को नियंत्रित करती है।
- अधिवृक्क ग्रंथियाँ : ये संख्या में दो होती है और गुर्दे के ऊपर स्थित होती हैं। ये कोर्टिसोल हार्मोन का स्त्राव करती हैं।
- अंडाशय : दो अंडाशय महिला प्रजनन अंगों का एक हिस्सा हैं। वे अंडे जारी करते हैं और सेक्स हार्मोन का उत्पादन करते हैं।
- वृषण : ये संख्या में दो होते है और पुरूष प्रजनन प्रणाली का एक हिस्सा है। ये शुक्राणु, पुरूष विकास और परिपक्कता के लिए एक हार्मोन टेस्टोस्टेरोन के उत्पादन के लिए जिम्मेदार हैं।
इनमें से एक या अधिक ग्रंथियों के कार्य में थोडी सी भी गड़बड़ी शरीर में हार्मोन के नाजुक संतुलन को बिगाड़ सकती है और अंतःस्त्रावी विकारों को जन्म दे सकती है। इन ग्रंथियों द्वारा स्त्रावित हार्मोन के स्तर में वृद्धि या कमी निम्नलिखित कारणों से हो सकती है :
- हार्मोन असंतुलन : जब हार्मोन का स्तर बहुत अधिक या बहुत कम हो जाता है, या शरीर हार्मोन के प्रति उचित प्रतिक्रिया नहीं करता है।
- एक ग्रंथि द्वारा दूसरी ग्रन्थि को हार्मोन जारी करने के लिए उत्तेजित करने में विफलता, जैसे हाइपोथैलेमस में समस्या, पिटयूटरी ग्रंथि में स्त्राव को प्रभावित कर सकती है।
- आनुवांशिक विकार : आनुवांशिक कारक अंतःस्त्रावी विकारों को प्रभावित कर सकते हैं।
- संक्रमण या बीमार COVID 19 जैसे संक्रमण अंतःस्त्रावी ग्रंथियों के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।
- चोट : अंतःस्त्रावी ग्रंथि में चोट लगने से भी अंतःस्त्रावी विकार हो सकता है।
- अंतःस्त्रावी विकार : सौर्दय प्रसाधन, खाद्य पैकेजिंग, प्रसंस्कृत/जंक फूड और कीटनाशकों जैसे रोजमर्रा के उत्पादों में पाए जाने वाले रसायन अंतःस्त्रावी विकार पैदा करते है।
अंतःस्त्रावी विकार के लक्षण
एंडोकाइना डिसऑर्डर के लक्षण उस ग्रंथि पर न्रिर्भर करते है जो इससे जुड़ी है । फिर भी, कुछ लक्षण हो सकते हैं – हृदय गति में परिवर्तन, त्वचा या आंखों में परिवर्तन, हड्डियों का फैक्चर, उच्च रक्त शर्करा, उच्च कैल्शियम, उच्च या निम्न रक्तचाप, वजन में अस्पष्टीकृत परिवर्तन, खराब यौन जीवन, बांझपन, मासिक धर्म च्रक मे गड़बड़ी आदि।
अंतःस्त्रावी तंत्र के कुछ रोग :
एक्रोमेगाली : एक्रोमेगाली पिटयूटरी ग्रंथि के खराब होने के कारण होता है, जो वृद्धि हार्मोन के अधिक उत्पादन के कारण होता है, जिसके परिणामस्वरूप चेहरे की विशेषताओं में परिवर्तन, बढ़े हुए होंठ या जीभ और बढ़े हुए हाथ और पैर होते है। यह एक सौम्य ट्यूमर के कारण होता है और आमतौर पर रक्त परीक्षण के बाद एमआरआई या सीटी स्कैन द्वारा इसका निदान किया जाता है।
गिगेंटिज्म : गिगेटिज्म तब होता है जब पिटयूटरी ग्रन्थि अधिक वृद्धि हार्मोन (जीएस और एचजीएच) का उत्पादन करती है। इस स्थिति में बच्चे (शिशु से किशोर) तेजी से बढ़ते हैं और बहुत लंबे होते हैं । इसके अलावा, उनके पास एक बड़ा सिर, ध्यान देने योग्य माथा, जबड़ा जो बाहर निकला हुआ लगता है, असामान्य चेहरा, मोटी उंगलियों और पैर की उंगलियों के साथ बहुत बड़ें हाथ और पैर, अत्यधिक पसीना, भूख न लगना और कमजोरी हो सकती है। इनके अलावा, यौवन की ओर धीमी गति, दृष्टि की समस्याएं पेट में बीमार महसूस करना आदि हो सकते हैं। यह आमतौर पर एडेनोमा (सौम्य ट्यूमर) या दुर्लभ आनुवंशिक स्थितियों (सोटोस सिंड्रोम, बेकविथ-विदेमान सिंड्रोम और वीवर सिंड्रोम) के कारण होता है। वयस्कों में भी गिगेंटिज्म एकोमेगाली जैसी स्थिति विकसित हो सकती है। एकोमेगाली भी असामान्य वृद्धि का कारण बनता है गिगेंटिज्म का निदान रक्त परीक्षण, मौखिक ग्लूकोज सहनशीलता परीक्षण, एमआरआई या सीटी स्कैन और खोपड़ी और जबड़े के एक्स-रे द्वारा किया जाता है।
टर्नर सिंड्रोम : टर्नर सिंड्रोम तब होता है जब पिट्यूटरी ग्रन्थि पर्याप्त वृद्धि हार्मोन जारी नहीं करती है। यह एक आनुवंशिक विकार है। आमतौर पर एक महिला के प्रत्येक कोशिका में दो एक्स गुणसूत्र होते हैं। टर्नर सिंड्रोम तब होता है जब इनमें से एक एक्स गुणसूत्र का पूरा या आंशिक भाग गायब होता है। डीएनए में यह परिवर्तन बच्चे के विकास को प्रभावित कर सकता है और सुनने, देखने, असमन्वय, हाथ और पैरों में सूजन, हृदय, यकृत, गुर्दे से संबंधित समस्याएं, छोटा कद, प्रजनन क्षमता को प्रभावित करने वाले अंडाशय का विकास और धीमा यौन विकास जैसी समस्याए पैदा कर सकता है। ज्यादातर, प्रजनन क्षमता की समस्याएं ही डॉक्टर के पास जाने का पहला कारण बनता है और तभी इसका पता चलता है। टर्नर सिंड्रोम का निदान आनुवंशिक परीक्षण से किया जाता है।
हाईपोपिटयूटरिज्म : हाईपोपिटयूटरिज्म एक ऐसी स्थिति है जिसमें पिटयूटरी ग्रन्थि बहुत कम या बिल्कुल भी हार्मोन नहीं छोड़ती है यह कई अलग-अलग बीमारियों के कारण हो सकता है। इस स्थिति से पीड़ित महिलाओं को मासिक धर्म आना बंद हो सकता है।
ग्रेव्स रोग : यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है जो 20 से 40 वर्ष की आयु की महिलाओं में थायरॉयड के अतिसक्रिय होने के कारण होती है, चिंता, चिड़चिड़ापन, तेज दिल की धड़कन, गर्मी का एहसास, पसीना आना और कंपन उभरी हुई आंखे, बढ़े हुए गण्डमाला इसके सबसे आम लक्षण हैं। इसका निदान रक्त परीक्षण द्वारा किया जाता है।
हाशिमोटो रोग : यह भी एक ऑटोइम्यून बीमारी है जो थायरायड ग्रन्थि द्वारा हार्मोन के कम स्त्राव के कारण होती है। थकान, उदास मूड, ठंड के प्रति संवेंदनशीलता, वजन बढ़ना, कब्ज, शुष्क त्वचा, पतले बाल, भंगुर नाखन बढ़े हुए थायरॉयड और सेक्स की कम इच्छा इसके सबसे आम लक्षण हैं।
हाइपरथायरायडिज्म : यह एक ऐसी स्थिति है जब थायरॉयड ग्रंथि अति सक्रिय हो जाती है। बैचैनी या घबराहट, गर्मी सहन न कर पाना, दिल की धकड़न तेज होना, वजन कम होना और थकान इसके मुख्य लक्षण हैं। इसका निदान रक्त परीक्षण द्वारा किया जा सकता है।
हाइपोथायरायडिज्म : यह वह स्थिति है जब थायरॉयड ग्रंथि प्रर्याप्त थायरॉयड हार्मोन का उत्पादन नहीं करती है। थकान, वजन बढ़ना, भारी मासिक धर्म या ठंड के प्रति संवेदनशीलता इसके सबसे आम लक्षण हैं और इसका निदान रक्त परीक्षण द्वारा किया जाता है।
मल्टीपल एंडोक्राइन नियोप्लासिया टाइप 1 और टाइप 2 (MEN 1 और MEN 2) : ये दुलर्भ आनुवंशिक स्थितियां है जो परिवारों के माध्यम से आगे बढ़ती हैं। वे पैराथायरॉयड, एड्रेनल और थायरॉयड गं्रथियों के ट्यूमर का कारण बनते है, जिससे हार्मोन का अधिक उत्पादन होता है।
जन्मजात एड्रेनल हाइपरप्लासिया (सीएएच) : पुरूष सेक्स हार्मोन (एंड्रोजन) के अत्यधिक स्त्राव और अन्य हार्मोन (कोर्टिसोल और एन्डोस्टेरोन) के अपर्याप्त स्त्राव के कारण एड्रेनल ग्रन्थियो की खराबी के कारण सीएएच होता है। इसके परिणामस्वरूप यौन अंगों का असामान्य विकास, वजन में कमी या वृद्धि, निर्जलीकरण और उल्टी होती है।
कुशिंग सिंड्रोम : कुशिंग सिंड्रोम को कोर्टिसोल के अत्यधिक स्त्राव के कारण होता है यह एक हार्मोन है जो एड्रेनल ग्रन्थियो द्वारा निर्मित होता है। तनाव के प्रति प्रतिक्रिया में इसका स्त्राव बढ़ जाता हैं । इसके लक्षणों में शामिल हो सकते हैं-भारी धड़, कंधे और गर्दन लेकिन पतले हाथ और पैर, कंधों के बीच कूबड़, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, थका हुआ या भावुक, पेट, कूल्हों और जांघो पर चोट और खिंचाव के निशान, ऑस्टियोपोरोसिस, महिलाओं में चेहरे और शरीर पर अधिक बाल और पुरूषों में इरेक्टाइल डिस्फंक्शन। यह मुख्य रूप से मस्तिष्क, या एड्रेनल ग्रन्थि या शरीर में ही और सोम्य ट्यूमर होने, एड्रेनल ग्रन्थियो की अधिक वृद्धि या लंबे समय तक कॉर्टिकोस्टेरॉइड दवा लेने के कारण होता है।
एड्रेनल थकान : लंबे समय तक तनाव एड्रेनल थकान का मुख्य कारण है और इसके परिणामस्वरूप थकान होती है। हालांकि थकान के अन्य कारण भी हो सकते हैं।
एडिसन रोग : एडिसन रोग एड्रेनल ग्रन्थि कॉर्टिसोल और एल्डोस्टेरोन हार्मोन के कम उत्पादन के कारण होता है। वजन कम होना, मांसपेशियों में कमजोरी, थकान, निम्न रक्तचाप, त्वचा का काला पड़ना इसके मुख्य लक्षण हैं।
मधुमेह : मधुमेह में या तो अग्न्याशय पर्याप्त इंसुलिन का उत्पादन करने में असमर्थ होता है या इसके प्रति प्रतिरोधी हो जाता है। थकावट, अधिक भूख, अधिक प्यास और अधिक पेशाब आना इसके मुख्य लक्षण हैं।
गर्भवधि मधुमेह : यह मधुमेह है जो गर्भावस्था के दौरान होता है और भविष्य में मधुमेह विकसति हो सकता है।
पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) : पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) एक आम हार्मोनल स्थिति है जो प्रजनन चरण में 10 में से 1 महिला को प्रभावित करती है। यह मासिक धर्म चक्र में गडबड़ी, त्वचा और बालों में परिर्वतन, अंडाशय पर सिस्ट, बांझपन, अत्यधिक बाल विकास और मुंहासे का कारण बनाता है। यह उच्च रक्तचाप, मधुमेह आदि जैसी अन्य चिकित्सा समस्याओं के जोखिम को भी बढ़ाता है।
हार्मोनल समस्याओं के लिए उपचार :
सभी हार्मोनल समस्याओं के लिए आहार :
- उचित पोष्टिक और संतुलित आहार जिसमें भरपूर मात्रा में हरी सब्जियां, मौसमी फल, दूध, छाछ, दही और अंकुरित अनाज शामिल हो, लेना चाहिए। प्रोटीन युक्त भोजन जो पचने में भारी हो जैसे पनीर, छोले, राजमा आदि को नियमित रूप से नहीं खाना चाहिए, कभी-कभार खा सकते हैं। आसानी से पचने वाले प्रोटीन जैसे दाल, दूध, छाछ लेना चाहिए। प्रोसेस्ड फूड, जंक फूड, मसालेदार भोजन, तैलीय भोजन, मांसाहारी भोजन, फ्रोजन फूड, बासी भोजन, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, कोल्ड ड्रिंक्स, मैदा, धूम्रपान, किसी भी रूप में तंबाकू और शराब से पूरी तरह बचना चाहिए।
- नाश्ता पोषक ततवों में भरपूर लेकिन पचने में हल्का होना चाहिए जैसे मौसमी फल, पानी में भिगोए हुए मेवे, ताजे फलों का रस (पैक्ड जूस नहीं) दूध, छाछ आदि। भारी नाश्ता जैसे पराठा, पूरी ब्रेड-बटर कभी नहीं लेना चाहिए।
- हर दिन कम से कम दो चम्मच देशी घी (अधिमानतः गाय का घी) लेना चाहिए। जीवनशैली इतनी सक्रिय होना चाहिए कि यह ठीक से पच जाए। पाश्चरीकृत मक्खन से बचना चाहिए। ताजा सफेद मक्खन लिया जा सकता है।
- बार-बार खाने से बचना चाहिए। आहार को दिन में केवल तीन बार तक सीमित रखना चाहिए-नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना। किशोर, युवा चार बार खा सकते हैं। बढ़ते बच्चो को चॉकलेट, बिस्कुट, नमकीन आदि से दूर रखें। उनके लिए हमेशा साबुत अनाज के आटे से बनी मठरी, भुने हुए अनाज, घर पर बने लड्डू (खजूर या बिना प्रोसेस किए स्टीविया के पत्ते से मीठा करके) रखें।
- सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि चाय और कॉफी छोड़ना जरूरी है क्योंकि इनमें मौजूद टैनिन तत्व जरूरी खनिजों और विटामिनों के अवशोषण को काफी हद तक सीमित कर देते हैं। अपनी चाय या ग्रीन टी की जगह ताजा अदरक, तुलसी, लेमन ग्रास, कश्मीरी कहवा, नींबू पानी आदि से बनी हर्बल चाय पिएं। आप अपनी पसंद और स्वाद के अनुसार इन हर्बल चाय में लौंग, काली मिर्च, इलायची, केसर आदि मिला सकते है।
योग (सभी हार्मोनल समस्याओं के लिए सामान्य)
- सूर्य नमस्कार, सर्वांगासन, हलासन, सेतुबंधासन, बिटिलासन, मार्जरीआसन, मंडूकासन, मर्कटासन, गोमुखासन और बटरफ्लाई आसन लाभाकारी है।
- शीर्षासन भी बहुत लाभकारी है, लेकिन इसे कभी भी सिर को जमीन, चटाई या कुशन पर रखकर नहीं करना चाहिए, इसके बजाए इसे शरीर को उल्टा करके हाथों (हथेलियों) को जमीन पर रखकर करना चाहिए और शरीर का भार सिर और गर्दन पर न रखकर पूरी तरह फैले हुए हाथों पर लेना चाहिए। इस प्रकार उल्टी स्थिति में आपका चेहरा जमीन/फर्श से 1) फीट की दूरी पर होगा।
- इसके अलावा सिर और चेहरे पर दिन में 3-4 मिनट तक थपथपांए।
- महिलाओं को मासिक धर्म के कुछ दिनों के दौरान योग से बचना चाहिए, बाकी दिनों में वे स्वतंत्र रूप से योग कर सकती है।
प्राणायाम : कपालभाति (30 मिनट), अनुलोम-विलोम (30 मिनट), भ्रामरी (5 मिनट) उद्गीत (5 मिनट)
एक्यूप्रेशर : स्त्राव बढ़ाने के लिए दिए गए बिंदुओं पर दक्षिणावर्त (क्लॉक वाइज) दबाव दें और स्त्राव कम करने के लिए वामार्वत (एंटी क्लॉक वाइज) दबाव दें।
Pituitary points also must be added
दवाईयां :
- हार्मोनल रोगों के लिए एलोपैथिक दवाएं कभी नहीं लेनी चाहिए क्योंकि उनके गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं।
- होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा, योग और एक्यूप्रेशर से युक्त हमारी एकीकृत चिकित्सा पद्धति हार्मोनल विकारों को स्थायी रूप से ठीक करने में सक्षम है।
- सही होम्योपैथिक दवा का चयन करना महत्वपूर्ण है, इसलिए इसका चयन रोगी या उसके रिश्तेदारों शुभचिंतकों पर नहीं छोड़ा जा सकता। यह केवल एक योग्य और अनुभवी डॉक्टर का काम है, इसलिए रोगियों को सलाह दी जाती है कि वे या तो हमसे संपर्क करें या अपने आस-पास के किसी अन्य होम्योपैथ से परामर्श लें। हालांकि, अन्य सभी प्राकृतिक चिकित्सा, योग और एक्यूप्रेशर आधारित उपाय सभी मामलों में प्रभावी और मान्य हैं।
